गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा के चुनाव परिणाम इस बार सारगर्भित और खासे दिलचस्प रहे हैं। दोनों ही राज्यों में भाजपा को स्पष्ट जनादेश मिला है। मगर कांग्रेस गुजरात में चुनाव हार कर भी “ श्रेय “ की हकदार है और हिमाचल प्रदेश में भाजपा को बेशक दो-तिहाई बहुमत मिला है मगर पार्टी प्रचंड जनादेश के बावजूद वीरभद्र सिंह से हार गई है। भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार प्रेम कुमार धूमल “मोदी लहर“ में भी चुनाव हार गए हैं। धूमल ही नही, भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष सत पाल सती भी चुनाव हार गए हैं। भाजपा महिला मोर्चे की अध्यक्ष और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की करीबी इंदु गोस्वामी भी चुनाव हार गई है। भाजपा के दिग्गज नेता और धूमल के समधी ठाकुर गुलाब सिंह, कुल्लू से महेश्वर सिंह और कांगडा जिले के वरिष्ठ नेता रवीन्द्र रवि भी हार गए हैं। इस स्थिति की तुलना में मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह अर्की से चुनाव जीत गए हैं। अर्की सोलन जिले में है और वीरभद्र सिंह ने पहली बार शिमला जिले से बाहर आकर चुनाव लडा है। वीरभद्र सिंह के आलोचक भी मानते हैं अपने परंपरागत चुनाव हलके से बाहर चुनाव लडने का मादा केवल उनमे है। बाकी नेता तो अपने हलके से बाहर नहीं निकल पाते हैं । धूमल अपने ही जिले में चुनाव नहीं जीत पाए। वीरभद्र सिंह ने पिछला विधानसभा चुनाव शिमला ग्रामीण से लडा था। इस बार उन्होंने इस हलके को पुत्र के लिए छोड दिया है। पुत्र बिक्रमादित्य सिंह भी चुनाव जीत गए हैं। वीरभद्र सिंह के परंपरागत रामपुर और रोहडू (दोनों आरक्षित) से भी कांग्रेस के उम्मीदवार जीते हैं। हिमाचल प्रदेश में वीरभद्र सिंह ने अकेले चुनाव प्रचार किया जबकि भाजपा के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द मोदी और उनकी टीम ने धुंआधार प्रचार किया । हिमाचल प्रदेष में भाजपा को 48 फीसदी से ज्यादा वोट के बावजूद भाजपा के षीर्श नेताओं का हार जाना यही दर्षाता है कि मतदाताओं को “ टेकन फॉर ग्रांटेड“ नहीं लिया जा सकता। गुजरात में भले ही भाजपा को स्पश्ट बहुमत मिला है मगर कांग्रेस ने 80 सीटें जीत कर भगवा पार्टी को आइना दिखाया है। चार दिन पहले सभी एक्जिट पोल्स में कांग्रेस को 60 प्लस और भाजपा को 110 प्लस सीटें दी गईं थी। एक्जिट पोल्स फिर गलत साबित हुअ हैं गुजरात की 27 सीटें ऐसी हैं जहां हार जीत का अंतर 2000 से नीचे रहा है। कांग्रेस को ग्रामीव क्षेत्रों में अच्छा रिस्पांस मिला है मगर षहरी क्षेत्रों के वह भाजपा के मजबूत बढत को तोड नहीं पाई है। भाजपा को मात देने के लिए कांग्रेस को षहरी क्षेत्रों में भी ग्रामीण क्षेत्रों जैसे प्रदर्षन की जरुरत थी। पिछले विधानसभा चुनाव की तरह इस बार भी 64 षहरी हलकों में भाजपा का प्रदर्षन काफी अच्छा रहा है। भाजपा 99 सीटें जीतकर आराम से षासन नहीं कर सकती। 80 सीटों लेकर कांग्रेस भाजपा सरकार को आराम से नहीं चलने देगी। भाजपा को इस सच्चाई को भी स्वीकार करना होगा कि जिस राहुल गांधी को पार्टी कोई चुनौती ही नहीं मानती थी और “पप्पू-पप्पू” कहकर उनका उपहास उडाती थी, उन्हीं से गुजरात में पार्टी को कडी चुनौती का सामना करना पडा। और चुनौती भी इतनी जबरदस्त कि प्रधानमंत्री को “गुजरात का बेटा“ , चायवाला जैसे जुमलों का सहारा लेना पडा। भाजपा को इस बात पर भी आत्ममंथन करना होगा कि कांग्रेस की ही तर्ज पर भाजपा भी एक व्यक्ति अथवा नेता की लोकप्रियता पर केन्द्रित होकर रह गई है। गुजरात में इस बार कोई स्थानीय मुद्दा और नेता प्रासंगिक नहीं रहा। पूरा चुनाव मोदी बनाम राहुल पर केन्द्रित रहा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के रहते भाजपा में “सामूहिक लीडरषिप“ धीरे-धीरे लुप्त हो रही है। भाजपा का मार्ग दर्षक मंडल भी अप्रांसगिक हो चुका है। यही दषा कांग्रेस की है। दोनों पार्टियों को इस बारे गहराई से मंथन करने की जरुरत है। लोकतंत्र में यह सब ज्यादा समय तक नहीं चल सकता।
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