हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले की सराज घाटी की विहंगम और विलक्षण प्राकृतिक सौंदर्यता की तरह ही इस क्षेत्र के लोग निश्चल और साफ दिल है। राज्य के नए मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर इसी क्षेत्र से आते हैं और पहली बार हिमाचल को सराज क्षेत्र से मुख्यमंत्री मिला है। राज्य के लिए इससे एक नए युग की शुरुआत हो सकती है और देवभूमि में “राम राज्य“ की नींव रखी जा सकती है। मगर नए मुख्यमंत्री के समक्ष तरह-तरह की चुनौतियां है और सबसे बडी चुनौती नव निर्वाचित मुख्यमंत्री ने खुद ही पेश की है। जयराम ठाकुर भाजपा को अगले कई सालों तक सत्ता में बनाए रखने का सपना बुने हुए हैं और पहले ही दिन उन्होंने इस आशय की घोषणा भी की है। कहते हैं कहना आसान है मगर करना बेहद मुश्किल । सत्तर के दशक के बाद से अब तक हिमाचल प्रदेश में कोई भी सरकार लगातार दूसरी बार पदस्थ नहीं हो पाई है। इसकी सबसे बडी वजह है कि कोई भी सरकार जन अपेक्षाओं और आकांक्षाओं को पूरी तरह से पूरा नहीं कर पाई हैं। हिमाचल प्रदेश में निश्चित तौर पर तरक्की हुई है और यह पहाडी राज्यों के विकास का मॉडल भी माना जाता है। मगर यह सब कहने-सुनने में ही अच्छा लगता है। जमीनी हकीकत कुछ और ही है। पीने का पानी है मगर न तो स्वच्छ और न ही माकूल। देहातों में बमुश्किल आध-एक घंटे पानी की सप्लाई मिलती है और कई जगह तो दूसरे-तीसरे दिन। राजधानी शिमला में गर्मियों में पीने के पानी की भीषण किल्लत रहती है। ब्यास नदी के किनारे बसे मंडी शहर में दिन में सुबह- शाम एक-एक घंटे और कई जगह एक घंटे पानी की सप्लाई मिलती है। स्वच्छ पीने का पानी बुनियादी सुविधा है और अगर सरकार आजादी के सात दशक बाद भी माकूल पीने का पानी मुहैया नहीं करा पाए, तो ऐसे मॉडल राज्य के तगमे का लोगों को क्या फायदा? अस्पताल हैं मगर न तो डाक्टर हैं और न ही गरीबों को दवाएं। सडकें हैं मगर उनके रख-रखाव के लिए बजट नहीं है। सडकें हिमाचल की जीवन रेखा है। संतोषजनक रखरखाव नहीं होने की वजह से हिमाचल में सडक दुर्घटनाओं में पिछले एक दशक में तीस हजार से अधिक लोगों को अपनी जानें गंवानी पडी हैं। बेतरतीब भवन निर्माण से शिमला, धर्मशाला समेत अधिकतर शहर कंकरीट के जंगल बन गए हैं और तबाही के मुहाने पर खडे हैं। राज्य की वित्तीय स्थिति बेहद खराब है। 2014-15 तक हिमाचल को राजस्व सरप्लस बनाने का लक्ष्य दिया गया था। यह लक्ष्य पाना तो दीगर रहा, इस साल राजस्व घाटा लगभग 5,000 करोड तक पहुंच गया है। जीएसटी से अगर राजस्व नहीं बढा तो इस साल घाटा और बढ सकता है। सरकार का पूरा खर्चा उधारी पर चल रहा है। सरकारी खर्चे का 22.55 फीसदी कर्जा लेकर चलाया जा रहा है। केवल 77.45 फीसदी ही अपने राजस्व से पूरा किया जाता है। और यह उतरोत्तर बढता ही जा रहा है। यानी विकास के लिए मात्र 40 फीसदी ही बचता है और इसमें भी काफी कुछ बिचौलिए और घूसखोर नौक्ररशाह खा जाते है। इतना ही नहीं अक्सर विकास का बजट वाहन, फर्नीचर जैसे आलतु-फालतू कामों पर खर्च किया जाता है। विकास पर तो दस फीसदी भी खर्च नहीं हो पाता। दुखद स्थिति यह है कि पिछले तीन दशक में किसी भी सरकार ने इस ओर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया है। इसके विपरीत सरकारी खजाने को राजनीतिक मह्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए लुटाने का सिलसिला बदस्तृुर जारी रहा है। नतीजतन, विकास के काम हो नहीं पा रहे हैं। जन अपेक्षाएं पूरी नहीं हो पाती हैं और जनता सरकार बदल देती है। जय राम ठाकुर को यह सब बदलना होगा और फिर से नई शुरुआत करनी होगी। अगर वे ऐसा नहीं कर पाए, उनका फिर से सत्ता में आने का सपना अधूरा ही रह जाएगा।
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