संयुक्त राश्ट्र में यरूशलम पर अमेरिका और इसराइल का साथ न देकर भारत ने अपने दो जिगरी दोस्तों को नाराज किया है। वीरवार को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के यरूशलम को इसराइल की राजधानी न बनाने के प्रस्ताव का भारत समेत सौ से भी अधिक देशों ने समर्थन किया। ट्रंप ने हाल ही में विवादित यरूशलम को इसराइल की राजधानी का दर्जा दिया है। अभी तेल अवीव इसराइल की राजधानी है। संयुक्त राष्ट्र में 128 देशों ने ट्रंप के खिलाफ वोटिंग की। 38 देश वोटिंग से गैर-हाजिर रहे। केवल 9 देशों ने ट्रंप के पक्ष में वोट डाले। इससे से क्षुब्ध राष्ट्रपति ट्रंप लाल-पीले हो रहे हैं और उन्होंने अमेरिका के खिलाफ जाने वाले देशों की सहायता बंद करने की धमकी दी है। अमेरिका की सबसे बडी फजीहत इस बात पर हुई है कि उसके खास मित्र माने जाने वाले पश्चिम और खाडी के देशोँ ने भी इस मामले में उसका साथ नहीं दिया। यरूशलम दुनिया का सबसे विवादित स्थल है और मध्य-पूर्व में अमन-चैन में सबसे बडा अवरोधक। इस्लाम, ईसाई और यहूदी तीनों ही इसे अपने-अपने धर्म के लिए अत्याधिक अहम मानते हैं। सदियों से यह प्राचीन और पवित्र शहर यहुदियों, ईसाईयों और मुसलमानों के दिलों में रचा-बसा हुआ है। इस शहर को कई बार ध्वस्त किया गया और कब्जाया गया । इस शहर की मिट्टी के कण-कण में इतिहास की परतें छिपी हुई है़। चार हिस्सो में विभाजित यरूशलम का “चर्च ऑफ दी होली सेपल्कर” दुनिया भर के ईसाईयों की आस्था का केन्द्र हैं। इसी जगह ईसा मसीह् को सूली पर चढाया गया था और यहीं वे अवतरित भी हुए थे। इसी स्थल पर ईसा का मकबरा भी है। मुसलमानों का विश्वास है कि पैगंबर मोहम्मद मक्का से यहां आकर पैगम्बरों की आत्माओं से मुखातिब हुए थे। कुछ कदम दूर ”डोम्स ऑफ दी रॉक“ है। मुसलमानों में मान्यता है कि इसी जगह से पैगंबर ने जन्नत की यात्रा की थी। मुसलमान हजारों की संख्या में यहां आते हैं और रमजान के महीने जुमे के दिन श्रद्धालुओं का भारी रश रहता है। यहूदी वाले इलाके में स्थित “होली ऑफ दी होलीज“ यहूदियों का पवित्र स्थल है। उनका विष्वास है कि यहीं से विश्व का निर्माण हुआ था और पैंगबर इब्राहिम ने अपने बेटे की बलि के लिए इसी जगह को चुना था। प्राचीन यरूशलम शहर फिलिस्तनियों और यहूदियों में सबसे बडे तनाव की वजह् है। अक्सर मामूली सा बदलाव भी बहुत बडे तनाव का कारण बन जाता है। 1967 के युद्ध में इसराइल ने पूर्वी यरूशलम पर भी कब्जा कर लिया था। इससे प्राचीन शहर भी इसराइल के बब्जे में आ गया मगर इसे आज तक अंतरराष्ट्रीय मान्यता नहीं मिली है। फलस्तीनी पूर्वी यरूशलम को अपनी राजधानी मानते हैं और बराबर इस तरह की मांग कर रहे हैं। उधर, यहूदी इसे अपनी राजधानी मानते हैं। फलिस्तीनी सदियों से पूर्वी यरूशलम में बसे हुए हैं और शहर की एक तिहाई आबादी फलिस्तीनियों की है। पूर्वी यरूशलम में यहूदियों को लगातार बसाया जाना भी तनाव का बडा कारण है। यरूशलम में कोई भी बदलाव अंतरराष्ट्रीय शांति प्रस्ताव से ही आ सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने यरूशलम को इसराइल की राजधानी घोषित करके न केवल फलिस्तीनियों को ही उकसाया है, अलबता अब तक की मान्य स्थिति को भी चुनौती दी है। “बहाव के साथ बहना (स्विम विथ टाइड), भारत की आजमाई हुई कूटनीति रही है। इस्तांबुल में सपन्न आईओसी की बैठक में बहुमत फलीस्तिनियों के साथ था। इसलिए भारत को अमेरिका और इसराइल का विरोध करना पडा। वैसे अमेरिका और इसरायल इस सच्चाई को समझते हैं कि अंतरराष्ट्रीय हित सामयिक कूटनीति से तय होते हैं, दोस्ती के मानदंड से नहीं ।
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