शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017

धर्म पर बवाल क्यों ?

भारत में धर्म अथवा धार्मिक मुद्दों पर चुनाव लडने पर प्रतिबंध है। इसके बावजूद राजनीतिक दल खुलकर धर्म और धार्मिक मुद्दों को खूब उछालते हैं। इस बार गुजरात चुनाव में धार्मिक मुद्दों को खुलमखुल्ला उछाल जा रहा है। भाजपा के कट्टर हिन्दुत्व के जवाब में कांग्रेस ने “साफ्ट हिन्दुत्व“ का चोला ओढ रखा है और भाजपा इससे तिलमिलाई हुई है। हिन्दुत्व भाजपा का ब्रांड है और कोई इस ब्रांड को चुराए, भगवा पार्टी को यह कतई सहन नहीं है। एक जमाने में जिस तरह कांग्रेस ने अल्पसंख्यकों के  तुष्टिकरण  को अपना ब्रांड बना रखा था, ठीक उसी तरह अब  “बहुसंख्यकों“ के धु्व्रीकरण  के लिए  “हिन्दुत्व“ को अपनाए हुए है। अस्सी के दशक में गुजरात में कांग्रेस ने अपना वोट बैंक पक्का करने के लिए खाम (क्षत्रिय,हरिजन, आदिवासी और मुस्लिम) का राजनीतिक फंडा अपनाया था और इसी के कारण ताकतवर पटेल (पाटीदार) समुदाय कांग्रेस से हमेशा   के लिए छिटक गया था। उसके बाद से 2017 के विधानसभा चुनाव में पहली बार पटेल  समुदाय आरक्षण के लॉलीपॉप पर कांग्रेस के समर्थन में आता  दिख रहा  है । बहरहाल, बुधवार को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के सोमनाथ मंदिर दर्शन  पर भी खासा बवाल खडा हो गया है। मंदिर के एंट्री रजिस्टर पर राहुल गांधी का नाम दर्ज किए जाने पर् भाजपा ने कांग्रेस उपाध्यक्ष के “धर्म“ को लेकर सवाल खडा किया है। दरअसल, सोमनाथ मंदिर का नियम है कि गैर-हिंदुओं  को  दर्शन  से पहले रजिस्टर में एंट्री करनी पडती है। यह नियम हिंदुओं पर लागू नहीं होता है। बुधवार को एंट्री रजिस्टर में राहुल गांधी और अहमद पटेल का नाम दर्ज किए जाने के बाद भाजपा ने इस मुद्दे को खूब उछाला है। अहमद पटेल क्योंकि हिंदू नहीं है, इसलिए उनका नाम एंट्री रजिस्टर मे दर्ज है मगर राहुल गांधी तो हिन्दू हैं, फिर उनका नाम रजिस्टर में क्यों दर्ज किया गया? एंट्री सिर्फ गैर-हिंदुओं के लिए है। भाजपा बार-बार यही सवाल कर रही है। कांग्रेस ने इस एंट्री को भाजपा की साजिश  करार दिया है और पार्टी बार-बार दावा कर रही है कि राहुल गांधी तो जनेऊधारी हिन्दू हैं। यह स्थिति निश्चित  तोर पर समकालीन  भारतीय राजनीतिक हालात की दुर्बलता को  दर्शाती  है। क्या भारत में सियासत का स्तर इतना गिर गया है कि राजनीतिक दलों को अपने अस्तित्व पर भी  सफाई  देनी  पडे? राहुल गांधी हिन्दु हैं या पारसी, यह कोई चुनाव का मुद्दा नहीं है। देश  में हर नागरिक को अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि  चुनने का पूरा अधिकार है। राहुल गाधी की पैतृक  पृष्ठभूमि पारसी है और उनकी दादी इंदिरा गांधी  नेहरु खानदान से संबंधित होते हुए भी “गांधी“ पारिवारिक पृष्ठभूमि  से जुडी रही़।  मगर इंदिरा गांधी के पति फिरोज गांधी किसी हिन्दु परिवार से नहीं थे। फिरोज गांधी ने अपना “गांधी“  उपनाम महात्मा गांधी से प्रेरित होकर बदला  था । मूलतः उनका नाम फिरोज जहांगीर “घांडी“ था और उनके माता-पिता पारसी थे। यह बात आज तक स्पष्ट  नहीं हो पाई है कि  पारसी खानदान के वंशज मात्र उपनाम बदलने से हिंदू कैसे बन गए? भारत में  अमूमन, पारिवारिक पहचान पैतृक  पृष्ठभूमि  से जुडी होती है। राहुल गांधी की पैतृक  पृष्ठभूमि पारसी है, तो क्या इसीलिए सोमनाथ मंदिर में उन्हें गैर-हिन्दू बताया गया। अगर ऐसा है तो इस स्थिति पर बवाल क्यों़? भाजपा को तो इस बात बार खुश  होना चाहिए कि राहुल गांधी की पैतृक पारसी पृष्ठभूमि के बावजूद वे जनेऊधारी हिन्दू हैं। तथापि, कांग्रेस का गुजरात में “सॉफ्ट हिन्द्त्व“ का  प्रयोग भी “ राजनीतिक अवसरवादिता“ ही है। इससे ग्रांड ओल्ड पार्टी का धर्मनिरपेक्ष चेहरा अब धर्मसाक्षेप नजर आ रहा है।  कांग्रेस को अन्तोगत्वा इससे कोई बहुत बडा फायदा नहीं होने जा रहा है। भाजपा की राह पर चलकर कांग्रेस भगवा पार्टी का विकल्प नहीं बन सकती।  नकल करके जैसे-तैसे परीक्षा  पास तो की ज सकती है, मगर अच्छे अंक हासिल  नहीं किए जा सकते।