प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुजरात विधानसभा चुनाव में पाकिस्तान के दखल की बात करके देश के भीतर और बाहर खलबली मचा दी है। प्रधानमंत्री ने रविवार को गुजरात में चुनावी सभाओं को संबोधित करते हुए आरोप लगाया कि पाकिस्तान गुजरात चुनाव में कांग्रेस के जरिए दखल दे रहा है और कांग्रेस नेता अहमद पटेल को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाने की जुगत में है। उन्होंने कांग्रेस और पाकिस्तान के पूर्व अधिकारियों के बीच मिली भगत के आरोप भी लगाए। उनका इशारा नई दिल्ली में पिछले सप्ताह कांग्रेस नेता मणि शंकर अय्यर द्वारा आयोजित भोज की ओर था। पिछले सप्ताह ही प्रधानमंत्री पर उदंड टिपण्णी के लिए कांग्रेस ने अय्यर को पार्टी से निलंबित कर दिया था। इस भोज में पूर्व प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह, पूर्व उप-राष्ट्रपति हमीद अंसारी, पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह, पूर्व विदेश सचिव सलमान हैदर के अलावा पाकिस्तान के भारत में वर्तमान उच्चायुक्त सोहिल महमूद और सीनियर जर्नलिस्ट्स भी मौजूद थे। प्रधानमंत्री ने इस भोज को गुप्त बैठक बताया है और आरोप लगाया है कि इसमें साजिश रची गई थी। प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान सेना के पूर्व डायरेक्टर जनरल अरशद रफीक द्वारा कांग्रेस नेता अहमद पटेल को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाने की इच्छा जताने वाले बयान को भी चुनावी साजिश से जोडा है। बहरहाल, देश का प्रधानमंत्री अगर यह बात कहे कि पाकिस्तान गुजरात के चुनाव में दखल दे रहा है तो अवाम इस पर विश्वास करेगा। मगर क्या वाकई ही पाकिस्तान गुजरात चुनाव में दखल दे रहा है? जम्मू-कश्मीर चुनाव कें पाकिस्तान के दखल के आरोप अक्सर लगते रहे हैं मगर गुजरात अथवा किसी अन्य राज्य में पाकिस्तान के दखल की बात जमती नहीं है। पाकिस्तान ने भी प्रधानमंत्री के इन आरोपों का खंडन करते हुए कहा है कि “भारत हमें इस मामले में न घसीटे“ और अपने बूते चुनाव लडे। पाकिस्तान में संसद अथवा प्रांतीय चुनाव तो क्या, गल्ली-मोहल्ले के चुनाव भी भारत का नाम लिए बगैर नहीं लडे जाते। जो नेता पाकिस्तान में भारत के खिलाफ जितना जहर उगलता है, कटटरपंथी मतदाताओं में वह उतना ही ज्यादा लोकप्रिय हो जाता है। तो क्या अब भारत के सियासी दल भी पाकिस्तान की राह पर चल पडे हैं और अब चुनाव पाकिस्तान के नाम पर लडे जाएंगें़? वैसे भारत के राजनीतिक रंगंमंच पर भी पाकिस्तान को कोसे बगैर कोई आयोजन मुक्कमल नहीं होता है। एक जमाने में जिस तरह अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए को भारत को अस्थिर करने और पूर्वोत्तर में अफरा-तफरी फैलाने के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता था, उसी तरह अब हर हिंसक वारदात के लिए पाकिस्तानी स्पाई एजेंसी आईएसआई का नाम लिया जाता है। आईएसआई गुजरात चुनाव के दौरान विध्वंसक गतिविधियों में संलिप्त हो सकता है मगर गुजरात का मुख्यमंत्री बनाने में उसकी भूमिका को देश का प्रधानमंत्री तक माने, यह बात जमती नहीं है। भारत की अवाम इतनी भी नासमझ नहीं है कि वह पाकिस्तान के झांसे में आ जाए। मणि शंकर अय्यर के रात्रि भोज को चुनावी साजिश से जोडना भी गले नहीं उतरता है। इस भोज में उपस्थित पूर्व प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री के इन आरोपों पर खेद भी जताया है। इस भोज को साजिश से जोडकर प्रधानमंत्री ने डाक्टर मनमोहन सिंह की निश्ठा पर ही सवाल उठाया है और पूर्व प्रधानमंत्री इससे आहत हुए हैं। इस बात कै लिए उन्होंने प्रधानमंत्री से माफी मांगने की मांग की है। विपक्ष की इस मांग मैं वजन है क़ि अगर देश खिलाफ साजिश हुई है तो सरकार कार्रवाई क्यों नहीं करती है। बहरहाल, गुजरात चुनाव इस बार ऊल-जलूल के मुद्दों पर लडा जा रहा है और लगभग सभी स्टैकहोल्डर्स विकास के एजेंड को भूल चूके हैं। मंदिर-मस्जिद, जात-पात, चरित्र हनन, पाकिस्तान, आतंकी हाफिज जैसे बेकार के मुद्दे उछाले जा रहे हैं जिनसे गुजरात की अवाम को कोई सरोकार नहीं है। इन सब बातों से तो यही लगता है कि गुजरात में चुनाव प्रचार “पागल“ हो गया है़़।
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