गुजरात और हिमाचल प्रदेश को फतेह करने के बाद अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के समक्ष और नई साल में कई चुनौतियां हैं। और कांग्रेस के नए अध्यक्ष के समक्ष तो और भी बडी चुनौतियां हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने तीन साल के कार्यकाल में 18 मेंसे 12 चुनाव जीत कर नया कीर्तिमान बना चुके हैं। इस मामले में मोदी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से थोडा पीछे हैं। 1967 में प्रधानमंत्री बनने के बाद तीन साल में 17 मेंसे 13 चुनाव जिताए थे। जबकि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी लगातार 29वीं चुनाव हार चुके हैं। गुजरात के चुनाव परिणाम हालांकि भाजपा के पक्ष में गए हैं मगर राहुल गांधी के लिए यह बात थोडी राहत भरी है कि उनके प्रचंड चुनाव प्रचार ने गुजरात में भाजपा को डरा-डरा कर जिताया है। गुजरात में पार्टी की जीत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए नाक का सवाल बनी हुई थी। अगर पार्टी प्रधानमंत्री के गृुह राज्य में ही हार जाती, इसका प्रतिकूल असर अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव पर पडता और कांग्रेस के लिए यह बहुत बडा हथियार साबित होता। पहली बार देश के प्रधानमंत्री ने विधानसभा चुनाव में 34 जनसभाओं को संबोधित किया है। मगर प्रधानमंत्री मोदी का हार को जीत में बदलने में महारत हासिल है और इस मामले में उनका कोई सानी नहीं है। कांग्रेस के युवा अध्यक्ष इस मामले में उनका दूर-दूर तक भी मुकाबला नहीं कर सकते। गुजरात में राहुल गांधी ने पाटीदार, ओबीसी और दलितों का मोर्चा खडा करके भाजपा के खिलाफ एक तगडा मोर्चा खडा तो किया मगर प्रधानमंत्री मोदी ने एक ही झटके में इसके प्रभाव को ध्वस्त कर दिया। विरोधियों की चुनावी रणनीति को तहस-नहस करना रणभूमि का अहम हिस्सा होता है। बनी-बनाई बिसात को कैसे तोडा जाता है, प्रधानमंत्री मोदी बखूबी जानते हैं। कांग्रेस के बडबोले नेता मणि शंकर अय्यर और कपिल सिब्बल खुद ही मोदी के दांव में फंस गए। मणि शंकर क्या बोले मोदी ने इसे “गुजरात की अस्मिता“ से जोड दिया और कपिल सिब्बल की बयानबाजी को हिदुओं की अस्मिता से। गुजरात के चुनाव ने सियासी दलों को “चुनावी चक्रब्यूह“ को तोडने का सटीक नुस्खा भी सिखाया है। जात-पात पर आधारित ताकतवार मोर्चे और नोटबंदी एवं जीएसटी के प्रतिकूल प्रभाव कैसे निष्क्रिय किया जाता है, प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी दिखा दिया है। बहरहाल, प्रधानमंत्री मोदी को अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में भी पार्टी के विजयरथ का सारथी बनना है। 2018 में कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश , छतीसगढ समेत आठ राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। गुजरात की तरह मध्य प्रदेश में भाजपा 2003 से लगातार सत्ता में है और छत्तीसगढ में 14 साल से। इन दोनों राज्यों में फिर से सत्ता में आना भाजपा के लिए नाक का सवाल है और कांग्रेस के लिए अपने अस्तित्व को बचाए रखने की चुनौती है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की असली अग्नि परीक्षा अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में होगी। इन चुनावों को लोकसभा का कर्टन रेजर माना जा रहा है। इन चुनावों के बाद मई 2019 में लोकसभा के चुनाव होने हैं, इन आठ राज्यों और गुजरात मे कुम मिलाकर 100 लोकसभाई हलकें। गुजरात और हिमाचल प्रदेश को मिलाकर 130 लोकसभा सीटें है। ये 130 सीटें 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के लिए बेहद अहम है। काग्रेस के लिए राजस्थान, मध्य प्रदेश , छतीसगढ के चुनाव तो अहम हैं ही, कर्नाटक के चुनाव भी बेहद मह्त्वपूर्ण है। भाजपा मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ में फिर से सत्ता में आने के प्रति आश्वस्त है मगर कांग्रेस कर्नाटक में फिर सत्ता में आएगी पार्टी खुद भी आश्वस्त नहीं है। इन राज्यों में अगर कांग्रेस का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहता है तो कांग्रेस अध्यक्ष की डगर और कठिन हो सकती है।
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