सोमवार, 11 दिसंबर 2017

12 साल लग गए?

संसद में पैसे लेकर सवाल पूछने के मामले में वीरवार को दिल्ली की अदालत ने अततः  11 पूर्व  सांसदों के खिलाफ आरोप तय कर ही लिए। 11 जनवरी से मामले की नियमित सुनवाई  शुरु हो जाएगी। इस साल दस अगस्त को अदालत ने आरोप तय करने के आदेश  दिए थे। अदालत को आरोप तय करने में 12 साल लग गए।  संसदीय इतिहास के इस काले कारनामे में आरोपी सांसद् सुनवाई टालने की हर मुमकिन कोशिश  करते  रहे और अदालत में पेश  होने से बचते रहे। इसी साल सितंबर में  भाजपा से संबंधित एक सांसद के बार-बार पेशी   में हाजिर नहीं होने से क्षुब्ध न्यायालय ने उन्हें अंतिम मौके देते हुए साफ कह दिया था कि दिसंबर में हर हाल में आरोप तय कर लिए जाएंगें।  इस मामले ने देश  के राजनीतिक दलों के चाल-चलन की कलई खोल कर रख दी थी। 12 दिसंबर, 2005 में एक स्टिंग स्टिंग  ऑपरेशन के दौरान 11 सांसदों को मोटी रकम लेकर संसद में सवाल पूछने के लिए रंगेहाथ  पकडा गया था। नार्थ  इंडिया स्मॉल मैन्युफेक्चरिंग एसोसिएशन के नाम 60 प्रश्न सूचीबद्ध  थे मगर केवल 25 ही पूछे गए थे।  आरोपी सांसदों में छह भाजपा के, 3 बहुजन समाज पार्टी और एक-एक कांग्रेस और राश्ट्रीय जनता दल के थे। दस लोकसभा के सदस्य थे  और 1 राज्यसभा का। इस स्कैम का भांडा फूटने पर संसद ने 25 दिसंबर को सभी 11 सांसदों को निलंबित कर दिया था। भाजपा ने तब लोकसभा में  आरोपी सांसदों के खिलाफ निलंबन की कार्यवाही  का मुखर विरोध  और लोकसभा का  बॉयकॉट  तक किया था। लोकसभा में विपक्ष के तत्कालीन नेता लाल  कृष्ण  अडवानी ने आरोपी सांसदों के निलंबन को ” अत्याधिक कठोर कार्रव्ाई“  बताया था।  इस फैसले के खिलाफ आरोपियों ने  सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। 2007 मे सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने आरोपी सांसदों  की याचिका को खारिज करते हुए लोकसभा अध्यक्ष की कार्रवाई को सही ठहराया था। मगर  संवैधानिक पीठ ने लोकसभा अध्यक्ष की इस दलील को नहीं माना कि देश  की  शीर्ष  अदालत को बर्खास्त सांसदों के मामले की सुनवाई का कोई अधिकार नहीं है। संविधान में सुप्रीम कोर्ट  को संवैधानिक व्याख्याओं का पूरा अधिकार दिया है और संसद भी संवैधानिक व्याख्या के दायरे में आता है। सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी सांसदों की इस दलील को भी नहीं माना कि उन्हें अपना पक्ष रखने का माकूल मौका नहीं दिया गया। बंसल समिति ने आरोपी सांसदों को उचित मौका दिया था। इस मामले का एक रोचक पहलू यह है कि दिल्ली हाई कोर्ट ने 2007 में  स्टिंग   ऑपरेशन करने वाले दो पत्रकारों के खिलाफ भी मुकदमा चलाने के आदेश  दिए थे। मगर बाद में अदालत ने इस मामले को इस बिला पर खारिज कर दिया कि किसी को स्टिंग  ऑपरेशन से नहीं रोका जा सकता। यह मामला फिर भारतीय न्यायप्रक्रिया  की धीमी प्रकिया को उजागर करता है। 12 साल के बाद आरोप तय होने के बाद भी न्याय प्रकिया और लंबी चल सकती है। इतना तय है कि सजा के खिलाफ आरोपी अगली अदालत में जाएंगे और अंतिम  फैेसला आने मे काफी वक्त लग सकता है। न्याय प्रकिया की एक और बडी खामी यह है कि सजायाफ्ता होने पर भी अपराधी लंबे समय तक आजाद घुमते हैं। बिहार के पूर्व  मुख्यमंत्री और राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव चारा घोटाले में सजायाफ्ता हैं मगर अभी भी बिहार के किंग मेकर बने हुए है। उनका पूरा परिवार सता का सुख भोग रहा है। पत्नी मुख्यमंत्री रह चुकी है, बेटा उप-मुख्यमंत्री और अब पार्टी ने उन्हें अपना मुख्यमंत्री प्रत्याशी  घोषित किया है। सुप्रीम कोर्ट  ने इस साल मई लालू और चारा घोटाले के अन्य आरोपियों पर भ्रष्टाचार  का   एक और मुकदमा चलाने के आदेश  दिए हैं। देश  में और भी कई नेता हैं जिन पर संगीन आपराधिक मुकदमे चलने के बावजूद वे सत्ता का सुख भोग रहे हैं। इस तरह की व्यवस्था राजनीतिक सुचिता लाने की बजाए भ्रष्टाचार को ही बढा रहा है।