जिस तरह राजनीति में न कोई स्थायी मित्र होता है, और न ही स्थायी दुश्मन , उसी तरह भारत में राजनीतिक दलों की कोई स्थाई आचार संहिता नही है। बदलाव के अथवा राजनीतिक अवसरवादिता के नाम पर अपने ही बनाए नियम तोडने में सियासी दल सबसे आगे रहते हैं। वामपंथी दलों को छोडकर देश का कोई भी राजनीतिक दल वंशवाद को पोषित करने के मामले में पीछे नहीं है। सबसे बुरा हाल तो ग्रांड ओल्ड पार्टी कांग्रेस का है। आजादी के बाद विगत सात दशकों में कांग्रेस में नेहरु और प्रांतीय दिग्गज नेताओं के वंशजों ्का ही वर्चस्व रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर अगर नेहरु के वंशजों का वर्चस्व रहा है तो क्षेत्रीय स्तर पर प्रांतीय कांग्रेसियों के वंशजों का। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने अपनी अमेरिकी यात्रा के दौरान केलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में माना था कि कांग्रेस में वंशवाद का बोलबाला है और इससे पार्टी को कुछ नुकसान हुआ है। मगर उनका यह भी कहना था कि अन्य राजनीतिक दल भी इस मामले में दूध के धुले नहीं हैं। यह बात सभी जानते हैं कि दो गलत काम मिलकर भी सही नहीं हो सकते। कांग्रेस की मौजूदा हालात के लिए काफी हद तक यही वंशवाद वाली मानसिकता जिम्मेदार है। कांग्रेस ने कभी अपने कर्मठ कार्यकर्ताओं की कद्र नहीं की। पार्टी में आम कार्यकर्ता को जनसभाओं के मंच सजाने-संवारने से ज्यादा कोई तवज्जो नहीं दी गई है। पार्टी के टिकटों का आवटन बडे नेताओं के परिजनों अथवा उनकी सिफारिश पर किया जाता है। वंशवाद ने कांग्रेस में लोकतांत्रिक नुमाइंदगी पनपने ही नहीं दी। इस वंशवाद को कम करने के लिए कांग्रेस ने ”एक परिवार, एक टिकट” का नियम बना रखा है मगर हिमाचल प्रदेश के दो दिग्गज नेताओं के लिए इस नियम को कूडेदान में फेंक दिया गया है। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के पुत्र और सीनियर नेता ठाकुर कौल सिंह की पुत्री को टिकट देकर पार्टी ने अपने ही नियम का मखौल उडाया है। वीरभद्र और कौल सिंह दोनों ही पार्टी के टिकट पर चुनाव लड रहे हैं। इतना ही नहीं पार्टी ने विधानसभा अध्यक्ष की सिफारिश पर उनके पुत्र को पाटी का उम्मीदवार बनाया है। एक और हलके में भी पिता की जगह पुत्र को टिकट दिया गया है। यानी पार्टी में वंशवाद चरम पर है। पार्टी में आम कार्यकर्ता बडे बेताओं के ंवंशजों के सामने एकदम बौने हो जाते हैं। काग्रेस मे वंशवाद के पनपने की सबसे बडी वजह है कि इसका शीर्ष नेतृत्व खुद वंशवाद की उपज है। जाहिर है इस स्थिति में पार्टी को वंशवाद रोकने में न तो कोई रुचि है और न ही इच्छा शक्ति। नामचीन अर्थशास्त्री मैंकर आल्सन ने वंशवाद को लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक बताया है। उनका आकलन है कि वंशवाद की राजनीति डाकुओं की तरह व्यवस्था की लूट-खसोट करती है। वंशवादी नेताओं के पास सभी साधन उपलब्ध होते हैं और ऐसे लोग व्यवस्थित तरीके से लंबे समय तक व्यवस्था को अपने नियंत्रण में रखने के लिए काम करते हैं।़ इस तरह की व्यवस्था लोकतंत्र के लिए बेहद घातक सिद्ध होती है। इस मामले में फिलीपीन्स की मिसाल दी जाती है। 1987 में लोकतंत्र की बहाली के बाद आज तक इस मुल्क के 60 फीसदी जन प्रतिनिधि (हाउस ऑफ रेेप्रेजेंटेटिव ) वंशवादी है। इसके कारण इस देश में गरीबी, भुखमरी और आर्थिक असमानता कम होने की बजाए और बढी है। देश का युवा नशे की गिरफ्त में है। और अब सरकार को नशे के खिलाफ मुहिम चलानी पड रही है। 2015 में ब्राजील में स्थानीय निकाओं (म्युनिसिपैलटी) पर किए गए अध्ययन में पाया गया था कि वंशवादी नेताओं के वर्चस्व वाली म्युनिसिपैलटीज का पूंजीगत व्यय गैर-वंशवादी से कहीं अधिक था। कांग्रेस ही नहीं, अन्य राजनीतिक दल भी वंशवाद को बढावा देकर देश की कोई सेवा नहीं कर रहे हैं। समय और राष्ट्रहित का तकाजा है कि वंशवाद का जड से उन्मूलन किया जाए।
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