सीमाओं पर दुश्मनों की विस्तारवादी भूख से निपटने के साथ-साथ सरकार को देश के भीतर अलगाववाद और नक्सलवाद की उत्तरोतर बढती समस्या से भी जूझना पड रहा है। नक्सल समस्या अलगाववाद से अधिक भयावह है। दुश्मनों की उनके भाडे के टटुओं से लडना आसान है मगर समाज और स्थापित व्यवस्था से बागी हुए अपने ही लोगों के हिंसक संघर्ष को दबाना काफी चुनौतीपूर्ण होता है। इस सदी की सबसे बडी विडंबना यही है कि पूरी दुनिया को भुखमरी और गरीबी से लडने की बजाए आतंक और हिंसा से जूझना पड रहा है। जिन दुलर्भ संसाधनों को भुखमरी और गरीबी हटाने पर खर्च किया चाहिए , उन्हें कानून-व्यवस्था पर खर्च करना पड रहा है। साठ के दशक में पश्चिम बंगाल से शुरु हुआ नक्सलवाद 2017 तक देश के 14 राज्तों में अपने पांव पसार चुका है और लगभग 80 जिलों में नक्सली संघर्ष अपने पांव जमा चुका है। 110 अन्य जिलों में नक्सलियों का प्रभाव बढता जा रहा है। आंध प्रदेश , बिहार और झारखंड के अधिकांश आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में नक्सलियों का खासा जनाधार है । देश के एक अग्रणी अंग्रेजी समाचार पत्र द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार आंध्र प्रदेश के 58 फीसदी लोग नक्सलियों को औरों से बेहतर मानते हैं। नक्सल समस्या मूलतः मौजूदा व्यवस्था के खिलाफ सशत्र ( आर्मेड) संघर्ष है और इसे चलाने वाले माओवादी जनशक्ति से व्यवस्था को बदलने के लिए कटिबद्ध है। इस स्थिति में सबसे बडा सवाल यही है कि क्या व्यवस्था को बदलने के लिए कटिबद्ध माओवादी अपने लक्ष्य को हासिल किए बगैर वार्ता के लिए राजी होंगे और अगर बातचीत के लिए तैयार हैं तो इसका स्वरुप क्या होगा? गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने नक्सलियों से सशर्त बातचीत की पेशकश की है। झारखंड की राजधानी रांची में नक्सली समस्या का जायजा लेते समय गृहमंत्री ने कहा है कि अगर नक्सली हिंसा छोड दें तो उनसे बातचीत हो सकती है। गृहमंत्री की इस पेशकश के कोई मायने नहीं है क्योंकि नक्सली हिंसा का मार्ग छोडने को तैयार है। आर्म्ड स्ट्रगल माओवादियों का मूलमंत्र है और यही सबसे बडा अंतर है जो उन्हें अन्य वामपंथियों से अलग पहचान देता है। वामपंथी किसान, मजदूर और आम आदमी के शांतिपूर्ण संघर्ष से व्यवस्था बदलना चाहते हैं मगर माओवादी आर्म्ड स्ट्रगल से। इसीलिए, भारत में वामपंथी दलों और माओवादियों के रास्ते एकदम अलग-अलग हैं। जनवरी 2005 में आंध्र प्रदेश सरकार और माओवादियों के बीच बातचीत हुई थी मगर यह बेनतीजा रही। तब माओवादियों ने जेल में बंद नक्सलियों की रिहाई और भूमि के पुर्नावंटन (रिडिस्ट्रिब्यूशन) की मांग रखी थी मगर सरकार इसके लिए भी तैयार नहीं थी। इसके बाद से नक्सली किसी भी तरह की बातचीत के लिए तैयार नहीं है। नक्सल पीडित बिहार, झारखंड और आंध्र प्रदेश तीनों राज्यों में इस समय भाजपा अथवा उसके सहयोगी दलों की सरकार है और माओवादी दक्षिणपंथी और उसके सहयोगी दलों को शोषण व्यवस्था का सबसे बडा प्रतीक मानते हैं। नक्सलियों से बातचीत की पेशकश से पहले पक्की जमीन तैयार की जानी चाहिए। माओवादियों का आदिवासी और भूमिहीनों में पक्का जनाधार है। सरकार की वन नीति से आदिवासियों की रोजी-रोटी छीनी गई है। माओवादियों का मानना है की सरकार के भूमि सुधार कानून जमींदारों और सांमतियों के हितों को पोषित करते हैं। जब तक भूमिहीनों और आदिवासियों को बसाने के लिए क्रांतिकारी भूमि सुधार कानून नहीं बनाए जाते, तब तक माओवादी बातचीत के लिए आगे नहीं आएंगें। और अगर सरकार से वार्ता के लिए तैयार होते भी हैं, तो फिर वहीं मांगें दोहराएंगे और सरकार इसके लिए राजी नही होगी। इस स्थिति में नक्सलियों से किसी भी तरह की बातचीत की पेशकश केवल सुर्खियां बटोरने वाली ही साबित होंगी। सरकार वाकई ही अगर नक्सलियों से बातचीत चाहती है, तो इसके लिए पहले जमीन तैयार करनी पडेगी।
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