बुधवार, 25 अक्टूबर 2017

वार्ता पर किससे ?

 आतंकवाद और अलगाववाद की भीषण आग में झुलस रहे  कश्मीर  पर  बातचीत की  पहल स्वागत योग्य है। मोदी सरकार ने खुफिया ब्यूरो के पूर्व  निदेशक दिनेश्वर शर्मा  को वार्ताकार नियुक्त किया है। इस पहल के अगले ही दिन मंगलवार को  राष्ट्रीय  सुरक्षा एजेंसी (एनआईए) ने कश्मीर  में आतंक और हत्या के प्रमुख साजिशकर्ता  और आतंकी संगठन हिजबुल के सरगना सैयद सलाहुदीन के पुत्र सैयद साहिद यूसुफ को टेरर फंडिग के मामले में गिरफ्तार करा लिया  । यूसुफ  को पहले भी गिरफ्तार किया जा चुका है।  यूसुफ जम्मू-कश्मीर  सरकार में कृषि  महकमे का कर्मचारी है। युसुफ के अलावा उसके तीन भाई और एक बहन भी राज्य सरकार के मुलाजिम है। आतंकी  सलाहुद्दीन के चार पुत्र और दो पुत्रियां है। चारों पुत्र और एक पुत्री सरकारी नौकरियों में है। यानी एक पुत्री को छोडकर पूरे  परिवार को सरकारी रोजगार मिला हुआ है।  कश्मीर  में आतंक और अलगाववाद के प्रमुख सरगना  सैयद सलाहुद्दीन के पूरे परिवार को सरकारी नीकरी मिलना राज्य के हालात बयां करता है। आजादी के बाद सात  दशकों में जम्मू-कश्मीर  में सियासी नेताओं और अलगाववादी ही फलते-फूलते रहे हैं। आम कश्मीर  बस मेहनत्-मजदूरी करके अपना पेट पालता रहा है। कश्मीर  के हस्तकरघा और हस्तशिल्प उत्पादों की देश  में ही नहीं विदेशों  में भी धूम है।  आतंक और  अलगाववाद ने उनका रोजगार भी छीन लिया है।  अलगाववादी खाते भारत की हैं मगर  पाकिस्तान के लिए काम करते हैं।  सैयद सलाहुद्दीन परिवार इस बात की सबसे बडी मिसाल है। बाप पाकिस्तान से भारत को अस्थिर करने की साजिश  रचने में मशगूल है और परिवार  ककश्मीर   सरकार के मुलाजिम बनकर मलाई चाट रहा  है। यूसुफ को गिरफ्तार करके सरकार ने यह संकेत दिए हैं कि अलगाावादियों से कोई बातचीत नहीं की जा सकती। सत्ता में आने के तीन साल बाद मोदी सरकार की  कश्मीर  नीति में बदलाव देखा जा सकता है। अब तक मोदी सरकार कश्मीर  पर सख्त रुख अपनाए हुए थी और आतंक और अलगाववाद को सैन्य कार्रवाई से शान्त  करने की पक्षधर थी। तीन साल के दौरान कश्मीर  घाटी में बेताहाशा  खून बह चुका है। बंदूक और गोली किसी भी समस्या का कोई हल नहीं है। इतिहास इस बात का गवाह है कि विद्रोह और स्वायत्तता की आवाज को जितनी सख्ती से दबाया जाता है, उतनी ही तेजी से यह और ज्यादा फूटती है। कश्मीर  समस्या पर अटल बिहारी वाजपेयी की नीति पर लौट आने का संकेत प्रधानमंत्री स्वाधीनता दिवस के संबोधन में दे चुके थे। प्रधानमंत्री ने तब कहा था कि राष्ट्रीय  मुख्य धारा से भटके लोगों को गोली और गाली की बजाए गले लगाने की जरुरत है। वार्ताकार तो नियुक्त को गया है मगर  सबसे बडा सवाल है कि वार्ता किससे की जाएगी। अलगाववादी और पाकिस्तान से वार्ता  किए बगैर  कश्मीर  में किसी भी वार्ता  की कोई प्रासंगिकता नहीं बनती है। अब तक कश्मीर  को लेकर कई वार्ताकार नियुक्त किए जा चुके हैं मगर कोई भी वार्ता सफल नहीं हो पाई है। 2001 में केन्द्र सरकार ने केसी पंत को वार्ताकार बनाया था मगर 2002 में इस पहल को बिना किसी नतीजे के बंद कर दिया गया। इसके बाद राम जेठमलानी और एनएन वोहरा कमेटी बनाई गई मगर ये भी कुछ नहीं कर पाईं। फिर सात साल बाद 2010 में संप्रग सरकार ने वरिष्ठ  पत्रकार दिलीप पडंगावकर की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समीति बनाई। राधा कुमार और एमएम अंसारी इसके सदस्य थे।  इस समिति ने केन्द्र सरकार को अपनी रिपोर्ट भी दी थी मगर इस रिपोर्ट  को जमीन निगल गई या आसमान खा गया, इसका आज तक पता नहीं चल पाया। और अब फिर सात साल बाद मोदी सरकार ने आईबी के पूर्व  निदेशक को वार्ताकार नियुक्त तो किया है मगर पुलिस अधिकारी की विश्वसनीयता   दिलीप पडंगावकर समिति से बढकर नहीं हो सकती। मोदी सरकार अलगाववादियों से वार्ता  करने के लिए तैयार नहीं है और अलगाववादी प्रधानमंत्री के सिवा किसी से भी वार्ता के लिए राजी नहीं है। फिर  वार्ता किससे ?