गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मोदी सरकार ने देश को महत्वाकांक्षी भारतमाला परियोजना की सौगात दी है। इस परियोजना के तहत अगले पांच साल के दौरान सात लाख करोड रु के निवेश से लगभग 83,000 किलोमीटर लंबी सडकों का निर्माण किया जाएगा। सरकार का मकसद माल की ढुलाई में तेजी लाना है और साथ ही भारी भरकम निवेश से देहातों में रोजगार के अवसर सृजित करना है। सरकार पांच साल के लक्ष्य को लेकर चल रही है जबकि उसके मौजूदा कार्यकाल का दो साल से भी कम समय बचा है। जाहिर है मोदी सरकार यह मान कर चली रही है कि देश की जनता-जनार्दन प्रधानमंत्री को कम-से-कम एक अवसर और देगी। सडकों का जाल बिछानेे के अलावा सरकार ने बढते एनपीए से जूझ रहे सरकारी बैकों में जान फूंकने और आर्थिक गतिविधियों को गति देने के लिए 2.11 लाख करोड रु का कैपिटलाइजेशन प्लान भी मंजूर किया है। सरकार की इस पहल का फौरन असर देखने को मिला। बुधवार को शेयर मार्केट में तेजी व्याप्त रही और बैकों के शेयर्स में जबरदस्त उछाल आया। देश के अग्रणी सरकारी बैंक एसबीआई के शेयरों में सबसे अधिक 28 फीसदी की तेजी दर्ज हुई। अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों-फिंच और मूडीज ने भी सरकार की इस पहल को अर्थव्यवस्था की ग्रोथ के अनुकुल बताया है। निसंदेह, नोटबंदी और जीएसटी की बिसंगतियों से त्रस्त भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अविलंब संजीवनी बुटि की दरकार है। बुधवार को जारी एक सर्वेक्षण का आकलन है कि मार्च 2018 को समाप्त होने वाले वित्तीय साल 2017-18 के दौरान भारत की ग्रोथ 6.7 ही रहेगी। यह ग्रोथ रेट चार साल में न्यूनतम है। सर्वेक्षण का आकलन है कि नोटबंदी के बाद जीएसटी के लागू होने से आर्थिक गतिविधियां सुस्त पड गई हैं और मांग भी अभी तक दबी हुई है। कॉर्पोरेट जगत के तिमाही रिजल्टस भी मंदी के ही संकेत दे रहे हैं। इन सब का असर रोजगार सृजन पर पडा है। सरकार सार्वजनिक तौर पर भले ही इस सच्च्चाई को न माने मगर आर्थिक मंदी और बढती बेरोजगारी के साथ-साथ महंगाई ने आम आदमी को परेशान कर रखा है। आरबीआई की मौद्रिक नीति तय करने वाली समिति ने भी माना है कि मुद्रास्फीति का खतरा अभी भी बना हुआ है और इसीलिए आरबीआई ने ब्याज दरों को यथावत रखा है। भारतमाला परियोजना और बैकों की कैपिटलाइजेशन प्लान से सरकार के बजटीय घाटे में खासा इजाफा हो सकता है। इससे घाटे को चार फीसदी से नीचे रखने का लक्ष्य भी अधूरा रह सकता है। सरकारी बैंकों के रिकैपिटलाइजेशन के साथ डेट मार्केट को भी प्रोत्साहित करने की जरुरत है। बैंकों का रिकैपिटलाइजेशन बैड लोन्स की इंताह को दर्शाता है। बढते एनपीए से तहस-नहस सरकारी बैंकों को नगदी देकर सरकार आर्थिक गतिििव्धयों को बढावा देना चाहती है। यह बात दीगर है कि रिकैपिटलाइजेशन से बैड लोन्स और बढ सकते हैं। बैकों को रिकैपिटलाइज करने के अलावा सरकार के पास और भी पुख्ता विकल्प थे। प्राइवेट बैंकों की तरह सरकारी बैंक भी बाजार से पूंजी जुटा सकते हैं। सरकार ऐसा कर सकती थी। इससे बैंकों को अपने पांव पर खडा होने का अवसर भी मिलता । बैकों के बैड लोन्स को सरकारी खजाने से भरा जाए, यह आम आदमी के हित में नहीं है। एक और विकल्प यह हो सकता है कि सरकारी बैंकों को दीर्घ कालीन बेल-इन बांड्स जारी करने की अनुमति दी जाए। बाद में जरुरत पडने पर इन्हें इक्विटी में बदला जा सकता है। बहरहाल, सुस्त पडी आर्थिक गतिविधियों को गति देने की जरुरत है और मोदी सरकार ने देर से ही सही, उपयुक्त कदम उठाया है। भारत का ग्रोथ रेट अभी भी चीन से थोडा ही कम है। आर्थिक गतिविधियों को गति देकर हम अगले वित्तीय साल में चीन को फिर पछाड सकते हैं।
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