भारत में उपभोक्ता संरक्षण कानून दुनिया का सबसे कमजोर माना जाता है। मौजूदा कानून से राहत मिलना तो दूर, उपभोक्ता की अदालत का चक्कर काटते-काटते जुतियां घिस जाती है। और अगर जैसे-तैसे राहत मिल भी गई, अदालत की व्यवस्था को ठेंका दिखाया जाता है। वीरवार को दिल्ली में आयोजित वैश्विक सम्मेलन मे प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत में वैदिक काल से उपभोक्ता संरक्षण को प्राथमिकता दी जाती थी। अथर्ववेद में व्यापारियों को नाप-तोल के लिए बाकायदा संहिता का उल्लेख है। इससे इस बात का भी पता चलता है कि संहिता के बावजूद भारत में कम तोलकर उपभोक्ताओं को चूना लगाने की कुप्रथा वैदिक काल से प्रचलित है और आज भी बदस्तूर जारी है। दूध वाले से लेकर रददी वाले, फल-सब्जी बिक्रेता, जिसे भी मौका मिले, उपभोक्ता को चूना लगाने की फिराक में रहता है। पेट्रोल पंपों पर कम तेल देकर इस तरह से ठगी की जाती है कि उपभोक्ता को पता तक नहीं चलता। रसोई गैस सिलेंडर से गैस से रास्ते मे गैस चोरी कर ली जाती है। मिठाइयों में सरेआम मिलावट की जाती है। कीमतों पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। मुनाफे की अधिकतम सीमा तय है और कीमतों को सार्वजनिक तौर पर लटकाना भी। फिर भी उपभोक्ता ठगा जाता है। बेचारा उपभोक्ता लडे तो किस-किस से। सरकार ऐसा कानून क्यों नहीं बनाती जिससे उपभोक्ता को रोज-रोज की ठगी से निजात मिले? भारत में आजादी के चार दशक बाद 1986 में सरकार ने आनन-फानन में उपभोक्ता संरक्षण कानून बनाया था। इस कानून के कार्यन्वयन के लिए जिला स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक उपभोक्ता अदालतों का गठन भी किया गया मगर यह व्यवस्था भी उपभोक्ता को समय बद्ध और त्वरित न्याय नहीं दे पाई। 2015 में संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएन) ने उपभोक्ता संरक्षण के लिए बाकायदा दिशा निर्देश जारी किए। इनमें उपभोक्ता संरक्षण को सरकार की पहली प्राथमिकता बताया गया है। इन दिशा -निर्दशों के मुताबिक 1986 के उपभोक्ता संरक्षण कानून को और अधिक प्रभावषाली बनाने के लिए सरकार ने पहल की है। सरकार के “न्यू इंडिया” के संकल्प में भी कडे उपभोक्ता संरक्षण कानून पर जोर दिया गया है। संशोधित कानून में गुमराह करने वाले विज्ञापन के खिलाफ सख्त कार्रवाई का प्रावधान किया जा रहा है। कानून के बावजूद देश में उपभोक्ताओं को विज्ञापनों के जरिए धडल्ले से गुमराह किया जाता है। ऐसे विज्ञापनों के खिलाफ कार्रवाई के लिए बाकायदा संस्था (एडवरटाइजमेंट काउंसिल ऑफ इंडिया) भी है मगर इससे भी गुमराह करने वाले विज्ञापनों पर अकुंश नहीं लग पाया है। भारत, चीन और अमेरिका इस समय उपभोक्ता वस्तुओं की सबसे बडी मार्केटस है। अमेरिका और चीन की तुलना में भारत अपेक्षाकृत काफी गरीब है मगर इसके बावजूद भी यह दुनिया की तीसरी बडी एमरजिंग मार्केट है। बॉस्टन कंसलटिंग ग्रुप (बीसीजी) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार 2025 तक भारत दुनिया की तीसरी सबसे बडी मार्केट होगी। 2005 में भारत की 44 फीसदी आबादी गरीब थी और उसके पास मोबाइल तक नहीं था। 2016 मे यह घटकर 31 फीसदी रह गई है। 13 फीसदी आबादी आार्थिक सपन्नता की सीढियां पार कर चुकी है। 2005 में जगुआर, और लैंड रोवर्स जैसी महंगी गाडियां खरीदने वालों की संख्या जहां 31 लाख थी, 2016 तक यह संख्या 65 लाख हो गई थी। बीसीजी के अनुसार 2025 तक महंगी गाडियां खरीदने वालों की संख्या 1 करोड 58 लाख तक पहुंच जाएगी। भारत में 65 फीसदी आबादी युवा (35 साल से कम) हैं और यह तबका उपभोक्ता वस्तुओं का सबसे बडा खरीदार है। एक जमाना था भारत में विदेशी वस्तुओं का जबरदस्त क्रेज्र था। मगर अब 60 फीसदी से ज्यादा लोग स्वदेशी वस्तुओं को तरजीह देते हैं और उन्हें विदेशी वस्तुओं से बेहतर मानते हैं। भारत में महिलाओं की भागीदारी भी उत्तरोतर बढ्ती जा रही है और यह तबका सबसे बडा उपभोक्ता है मगर सबसे ज्यादा ठगा भी जाता है। भारत में सख्त से सख्त उपभोक्ता कानून की अविलंब जरुरत हैं।
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