मंगलवार, 10 अक्टूबर 2017

“विकास पागल हो गया है“

सोशल मीडिया पर पिछले कुछ महीनों से गुजरात पर “विकास पागल हो गया है“ हैशटैग से जबरदस्त अभियान चलाया जा रहा है। भाजपा इससे बेहद परेशान है। इससे पता चलता है कि गुजरात में भाजपा के समक्ष आने वाले विधान सभा चुनाव मेँ कितनी चुनौतियां हैं। पिछली बार सोशल मीडिया की बदौलत ही गुजरात में भाजपा को तगडे वोट मिले थे।  राज्य में चुनाव सरगरर्मियां चरम पर है। प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने सौराष्ट्र , दक्षिण और मध्य गुजरात और वडनगर का पिछले सप्ताहांत  में तूफानी दौरा किया। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी  सौराष्ट्र  का दौरा कर चुके हैं और सोमवार को वे फिर से मध्य गुजरात के दौरे पर है। इस बार कांग्रेस प्रचार की खास बाद यह है कि अल्पसंख्यकों का  तुष्टिकरण करने  की बजाए वह सॉफ्ट  हिंदुत्त्व पर जोर दे रही है। इसी लक्ष्य से राहुल गांधी रास्ते में पडने वाले हर मंदिर जा रहे हैं। पिछले दौरे में राहुल ने द्धारका और चोटिला मंदिर में पूजा-अर्चना की थी। इस बार राहुल का फागवेल मंदिर जाने का कार्यक्रम है। नरेन्द्र मोदी ने 2002 में फागवेल मंदिर से ही अपना चुनाव प्रचार  शुरु किया था। राज्य में 22 सालों से भारतीय जनता पार्टी  सत्तारुढ  है। गुजरात में 22 सालों में पहली बार भाजपा को कांग्रेस के अलावा हार्दिक पटेल के अनामत आंदोलन और ओबीसी मंच एवं दलित नेता जिग्नेश  मेवाणी के मंच से चुनौती मिल रही है। और पहली ही बार ऐसा होगा कि विधानसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी राज्य की सियासत और राजकाज में  शामिल नहीं है। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भाजपा ने आनंदीबेन पटेल को मुख्यमंत्री बनाया था मगर वे पार्टी नेतृत्व के मानदंडों पर खरी नहीं उतर पाईं। उनकी जगह विजय रुपाणी को मुख्यमंत्री बनाया गया है मगर उनमें भी नरेन्द्र मोदी जैसा स्पार्क  नहीं है। इस बार भाजपा के समक्ष कई चुनौतियां है। अब तक भाजपा का समर्थक रहा  पटेल समुदाय हार्दिक पटेल के आंदोलन के कारण भाजपा से छिटक चुका है। राज्य में करीबी 12 फीसदी पटेलों की आबादी है और यह समुदाय कांग्रेस की ओर आकर्षित  हो रहा है। कांग्रेस ने हार्दिक पटेल के 9 समर्थकों को पार्टी टिकट देने का प्रस्ताव किया है। हार्दिक 20 सीटें मांग रहे हैं। भाजपा को सबसे ज्यादा  परेशानी अल्पेश  ठाकुर के ओबीसी मंच और दलित मंच से  हो सकती है। राज्य की 78 आबादी ओबीसी, दलित और अनूसूचित जाति की है। भाजपा के लिए राहत की बात यह है कि ओबीसी समुदाय पटेलों को  आरक्षण देने के सख्त खिलाफ है।  अल्पेश  ठाकुर की अगुवाई में  ओबीसी मंच का गठन भी इसी मकसद से किया गया है।  अल्पेश  ठाकुर ओबीसी, दलितों और जन जातियों को एक मंच पर लाने की भरसक कोशिश  कर रहे हैं। वे किस ओर जाएंगे, फिलहाल यह स्पष्ट  नहीं है मगर इतना तय है कि वे हार्दिक पटेल के साथ नहीं जाएंगे और अगर कांग्रेस हार्दिक से चुनावी गठजोड करती है तो  ओबीसी  भाजपा का साथ देंगे। वैसे ओबीसी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ रहे हैं। संसद के मानसून सत्र के दौरान काग्रेस और विपक्ष के भारी विरोध के बावजूद ओबीसी बिल पारित नहीं हो पाया था। इस बिल के पारित होने से नेशनल कमीशन फॉर बैकवर्ल्ड  क्लासिस को संवैधानिक दर्जा  मिल जाता। अब भाजपा गुजरात और हिमाचल में इस मुद्दे को उछाल कर कांग्रेस को ओबीसी विरोधी बता रही है। भाजपा की सबसे बडी चिंता बेरोजगारी को लेकर है। नोटबंदी, जीएसटी और रेरा के लागू होने से गुजरात में विकास की गति रुकी है और रोजगार के अवसर कम हुए हैं। इसी स्थिति को सामने रखकर प्रधानमंत्री ने अपने गुजरात दौरे में “इस बार दीवाली“ पहले आ गई है“ कहकर जीएसटी का उल्लेख किया। पार्टी अध्यक्ष अमित ह के पुत्र जय शाह को लेकर उठा ताजा विवाद भाजपा पर भारी पड सकता है। इस बार के विधानसभा चुनाव में भाजपा की राह इतनी आसानी नहीं होगी जितनी पहले हुआ करती थी।