गुरुवार, 12 अक्टूबर 2017

“बनिया“ है सरकार

उपनिवेशवादी व्यवस्था से मुक्ति के बाद भारतीय जनमानस को स्वदेशी  सरकार से  कल्यायणकारी (वेल्फेयर स्टेट) सुशासन की उम्मीद थी मगर ऐसा नहीं हुआ। सच यह है कि ऐसा मुमकिन भी नही है। सरकार तो सरकार है, फिर चाहे वह रजवाडों की हो, फिरंगियों की या स्वदेशी । सरकार के अपने “शाही“  खर्चे होते हैं और इन्हें जनता पर कर लादकर ही पूरा किया जा सकता है। मगर वेल्फेयर स्टेट उपनिवेशवादी और रजवाडाशाही व्यवस्था से एकदम भिन्न होनी चाहिए और उसका कर ढांचा प्रगतिशील। यानी ऐसी कर व्यवस्था जिससे उत्पादन और रोजगार को बराबर बढावा मिलता रहे। भारत में कर व्यवस्था में सुधार के लिए पहले वैट का विकल्प तैयार किया गया और अब जीएसटी लागू किया गया है। जनता पर करों का बोझ कम करने और उत्पादन को बढाने के लिए इन व्यवस्थाओं को लागू किया गया। फिलहाल ऐसा कुछ भी नही हो पाया है। जीएसटी भी लागू हो चुका है और वैट अपनी जगह बरकरार है। इस दोहरी व्यवस्था से अर्थव्यवस्था को खासा नुकसान पहुंचा है। ताजा आंकडों के मुताबिक अप्रैल-जून तिमाही में ग्रोथ रेट गिर कर 5.7 ही रह गया था और जुलाई-सितंबर की तिमाही में भी इसमें अप्रत्याशित इजाफे के कोई आसार नहीं है। सितंबर में खुदरा महंगाई 3.60 फीसदी को पार कर गई थी जबकि अगस्त में यह 3.36 फीसदी थी हालांकि अभी भी यह आरबीआई के चार फीसदी के मानदंड से नीचे है। आरबीआई ने खुदरा महंगाई को चार फीसदी से नीचे रखने का लक्ष्य तय कर रखा है और अपनी मौद्रिक नीति को भी इसी अनुकूल ढाला जा रहा है। अभी त्यौहारी सीजन शुरु हुआ है और दिसबंर तिमाही में महंगाई के बढने के आसार हैं। महंगे डीजल का  महंगाईको बढाने में अहम योगदान है। डीजल के दाम बढने से माल भाडा फौरन बढ जाता है और इससे चीजों के दामों में उछाल आता है। जुलाई से सितंबर के दौरान डीजल के दामों मे 5ं.50 से 6 रु प्रति लीटर का इजाफा हो चुका है। सितंबर में डीजल के दाम तीन साल के उच्च स्तर पर प थे जबकि अंतरराष्ट्रीय  बाजार में तेल की कीमतें नरम पडी हुईं है। पेट्रोल-डीजल की कीमतों के निर्धारण में केन्द्रीय आबकारी  शुल्क और राज्यों के वैट की बडी भूमिका है। कीमतों में 50 फीसदी से भी अधिक  शुल्क है और इन्हें कम करते हुए सरकार के हाथ-पांव फूल जाते हैं। देश  में हर वस्तु पर जीएसटी लागू है मगर पेट्रोल-डीजल को इससे बाहर रखा गया है ताकि केन्द्र और राज्य अपनी जेब भरती रहें। 2014 से डीजल की अंतरराष्ट्रीय  कीमतों में मात्र 2 से 3 रु का इजाफा हुआ है मगर 2015 से डीजल पारा एक्साइज  शुल्क 13.47 रु प्रति लीटर बढाया  जा चुका  है। इसी तरह वैट मे भी पिछले तीन साल में 30 फीसदी से ज्यादा इजाफा हो चुका है। जनता के तीखे मिजाज को भांपते हुए मोदी सरकार ने 4 अक्टूबर को पेट्रोल-डीजल पर आबकारी शुल्क में प्रति लीटर 2 रु की छूट देते हुए और ज्यादा राहत देने का ठीकरा राज्यों पर फोड दिया और उनसे वैट कम करने को कहा। अब तक केवल तीन राज्य भाजपा शासित गुजरात और महाराष्ट्र  और कांग्रेस  शासित हिमाचल ने पेट्रोल -डीजल पर वैट में कटौती की है। गुजरात और हिमाचल में विधानसभा चुनाव सन्निकट हैं, इसलिए इन राज्यों को ऐसा करना पडा।  इस महाराष्ट्र  को  पडोसी गुजरात के कारण   वैट कम  करना पड़ा जबकि 18 राज्यों में भाजपा की ही सरकारें हैं। बहरहाल, पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने के बाद कींमतों में भारी गिरावट आएगी, ऐसी कोई संभावना नहीं है। न तो केन्द्र और न ही राज्य पेट्रोल-डीजल से आने वाले राजस्व में मामूली से गिरावट के लिए तैयार है। सरकार भी उसी विशुद्ध स्वदेशी  “बनिए“ की तरह है जो ग्राहकों (जनता) से ज्यादा से ज्यादा ऐंठने की मानसिकता रखता है।