तमाम चिंताओं और आलोचना के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बुधवार को अर्थव्यवस्था की मौजूदा हालत पर देश वासियों को आश्वस्त क्यों करना पडा ? और उनके स्पष्टीकरण से क्या राष्ट्र वास्तव में आश्वस्त हुआ है । प्रधानमंत्री ने आलोचकों को करारा जबाव देते हुए इस बात पर जोर दिया कि अर्थव्यवस्था में सुस्ती पहली बार नहीं आई है। इससे पहले कई बार ऐसा हो चुका है मगर कुछ लोग हैं जिन्हें रात को तब तक चैन की नींद नहीं आती, जब तक वे निराशाजनक बातें न कर लें। प्रधानमंत्री का इशारा पार्टी के भीतर और बाहर उन लोगों की ओर था, जो अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति के लिए नोटबंदी और जीएसटी को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। प्रधानमंत्री ने माना है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में गिरावट आई है मगर स्थिति नियंत्रण में है। आंकडों के जरिए प्रधानमंत्री ने देश को भरोसा दिलाने की कोशिश की कि नोटबंदी के बाद जीडीपी और नगदी का अनुपात 9 फीसदी तक पहुंच गया है। यह इस बात का संकेत है कि सिस्टम में पर्याप्त नगदी है और सतत निवेश हो रहा है। निवेश होता रहे तो रोजगार के अवसर बढते हैं। सुस्ती का सबसे ज्यादा असर रोजगार पर पडता है। रोजगार में अगर गिरावट आती है तो आय कम होती है और इससे मांग घटती है। मांग कम होने से विकास दर गिरती है। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा है कि इस समय निवेश उच्च स्तर पर है और सरकार का राजस्व घाटा नियंत्रण में है। तथापि, इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि पहले नोटबंदी और अब जीएसटी के कारण अर्थव्यवस्था में चिंताजनक गिरावट आई है और इसी वजह पार्टी के भीतर भी इसकी सुगबुगाहट शुरु हो गई है। सबसे पहले भाजपा के वरिष्ठ नेता डाक्टर सुब्रमण्यम स्वामी अर्थव्यवस्था की स्थिति पर चिंता जाहिर कर चुके हैं़। फिर पूर्व वित्त मंत्री एवं पार्टी के वयोवृद्ध नेता यशवंत सिन्हा ने विस्तृत लेख में अर्थव्यवस्था की सुस्ती पर गहरी चिंता जाहिर की है। और दो दिन पहले पूर्व केन्द्रीय मंत्री अरुण शौरी र ने नोटबंदी को “अब तक की सबसे बडी मनी लॉड्रिंग स्कीम“ बताया है। इससे पहले कि नोटबंदी और जीएसटी को लेकर देश में आर्थिक और राजनीतिक संकट खडा हो जाए, प्रधानमंत्री को इन फैसलों का खुलकर बचाव करना पडा। मगर सच्चाई ज्यादा देर तक छिप नहीं सकती। नोटबंदी और जीएसटी से अर्थववस्था को खासा नुकसान हुआ है, इसे नकारा नहीं जा सकता। अभी तक अर्थव्यवस्था की हालत पर जो भी आंकडे आ रहे हैं, वे संगठित क्षेत्र के हैं और इससे पूरी तस्वीर स्पष्ट नहीं होती है। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 45 फीसदी हिस्सेदारी असंगठित क्षेत्र की है और अगर इसमें गिरावट आती है, तो जीडीपी के ग्रोथ खासी प्रभावित होती है । नोटबंदी पर सरकारी क्षेत्र के सबसे बडे स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, पंजाब, हरियाणा एवं दिल्ली (पीएचडी) चैंबर ऑफ कामर्स और ऑल इंडिया मैन्युफैक्चरिग एसोसिएशन के सर्वेक्षणों में नोटबंदी से 60 से 80 फीसदी गिरावट का अनुमान लगाया गया था। इस गिरावट में ऐसे कई कारक हैं, जिनका दीर्घकालीन असर होता है। इन हालत में जीडीपी की वृद्धि में गिरावट आना तय है। 2017 की पहली तिमाही अप्रैल-जून के दौरान भारत की विकास दर तीन साल के न्यूनतम मात्र 5.7 फीसदी थी। इसीलिए अधिकतर अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी भारत की जीडीपी में अप्रत्याशित गिरावट की संभावनाएं जता रही हैं। अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी फिंच ने इस साल की विकास दर को 7.4 से घटाकर 6.9 फीसदी कर दी है। लेकिन इस रेटिंग एजेंसी का यह भी कहना है कि नोटबंदी और जीएसटी का नकारात्मक प्रभाव जल्द ही लुप्त हो जाएगा। सबसे ज्यादा चिंता मंहगाई दर को लेकर है। महंगाई के मौजूदा आंकडों में सर्विस सेक्टर को शामिल नहीं किया जाता है जबकि सबसे ज्यादा असर इसी सेक्टर पर पडता है। इस स्थिति के मद्देनजर मंहगाई दर भी कमतर आंकी गई है जबकि यह 6 फीसदी से ज्यादा हो सकती है। संक्षेप में अगर जीडीपी की ग्रोथ कम हो और मंहगाई बढ रही हो, तो आम आदमी का परेशान होना तय है।
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