अमेरिका ने चीन के महत्वाकांक्षी “वन वेल्ट, वन रोड“ पर भारत की चिंताओं को साझा करते हुए इसका मुखर विरोध करके नई दिल्ली का पक्ष मजबूत किया है। अमेरिका के रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस ने माना है कि चीन का “वन वेल्ट, वन रोड-ओबोर“ (इकनॉमिक कॉरिडर) विवादित गिलगित-बल्तिस्तान से गुजरता है और किसी को भी किसी मुल्क की संप्रभुता में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है। अमेरिकी रक्षा मंत्री पिछले सप्ताह भारत की यात्रा पर थे । ट्रंप प्रशासन के दौरान यह केबिनेट स्तरीय पहला दौरा था। इस दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण से सामरिक मुद्दों पर विस्तृत चर्चा की। चर्चा के दौरान चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (इकनॉमिक कॉरिडर) का मुददा भी उठा। भारत के साथ-साथ “वन वेल्ट, वन रोड“ अमेरिका के लिए ज्यादा खतरनाक है। “वन वेल्ट, वन रोड“ के माध्यम से चीन अपने महाद्धीपीय (कॉन्टिनेंटल) और समुद्री (मैरीटाइम) हितों को सुरक्षित कर यूरोएशिया में अपनी उपस्थिति बढाना चाहता है ताकि इस क्षेत्र के अपार प्राकृतिक साधनों का दोहण किया जा सके। अमेरिका को यह स्थिति कतई स्वीकार नहीं है और चीन की यूरोएशिया में उपस्थिति अमेरिकी हितों पर प्रहार कर सकती है। दक्षिण चीन सागर में बीजिंग पहले ही अमेरिका के सामने दीवार बनकर खडा है। अमेरिका, फिलीपींस, विएतनाम, मलेशिया, इंडोनेशिया, बू्रनेई और ताइवान के भारी विरोध के बावजूद चीन इस क्षेत्र पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कर चुका है और अमेरिका को कडी चुनौती दे रहा है। दक्षिण चीन सागर के रास्ते हर साल 5 खरब यूएस डॉलर का कारोबार होता है। चीन इस पर नियंत्रण चाहता है जबकि अमेरिका समेत दुनिया के अधिकतर देश इसे व्यापार के लिए मुक्त क्षेत्र बनाना चाहते है। इसी मकसद से अक्सर अमेरिका और अन्य देश यहां स्वतंत्र नेविगेशन ऑपरेशन भी चलाते हैं। अपनी विस्तारवादी भूख को मिटाने के लिए चीन ने 2014 में “वन वेल्ट, वन रोड“ प्रोजेक्ट को शुरु किया था। इस परियोजना के तहत चीन अगले कुछ सालों में 68 देशों में इंफरास्ट्रक्चर विकसित करने पर तीन खरब डालर का निवेश करेगा। मूलतः इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट का मकसद पुराने जमाने के सिल्क रुट को पुर्नजीवित करना है। चीन में 220 से 280 एडी के हान साम्राज्य को स्वर्णिम माना जाता है। हान साम्राज्य के दौरान सेंट्रल और साउथ एशिया के कारंवा मार्गों से चीन का व्यापार अफ्रीका, मध्य पूर्व और यूरोप तक दूर-दूर तक फैला हुआ था। चीन-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडर भी इसी का हिस्सा है। इस साल मई में चीन ने भारत को भी इस कॉरिडर में शामिल होने का न्यौता दिया था मगर भारत ने इसे अस्वीकार कर दिया। भारत ने शुरु से इस आर्थिक गलियारे का मुखर विरोध किया है। यह गलियारा कश्मीर के विवादित गिलगित-बल्तिस्तान क्षेत्र से गुजरता है और भारत का इस क्षेत्र पर पुख्ता दावा है। यह क्षेत्र कश्मीर का अंतरंग हिस्सा है। आजादी से पहले गिलगित-बल्तिस्तान कश्मीर रियासत में हुआ करता था मगर 1948 में रियासतों के विलय के समय पाकिस्तान ने धोखे से इसे हथिया लिया था। भारत-चीन युद्ध के फौरन बाद 1963 में पाकिस्तान ने गिलगित-बल्तिस्तान का लगभग 5000 से 8000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र चीन को भेंट कर दिया था। यह क्षेत्र मूलतः शिया बहुल है मगर 1970 में पाकिस्तान द्वारा सुन्नी मुसलमानों को इस क्षेत्र में स्थाई तौर पर बसाने के बाद से गिलगित-बल्तिस्तान का डेमोग्राफिक स्वरुप ही बदल गया है। पूरी दुनिया को लगता है कि कश्मीर समस्या भारत अधिकृत क्षेत्र तक सीमित है और गिलगित-बल्तिस्तान पाकिस्तान का हिस्सा है। चीन को दिया गया क्षेत्र भी विवादित है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा बनने के बाद भारत का दावा और कमजोर हो सकता है। चीन के वन बेल्ट, वन रोड की काट के लिए हालांकि भारत ने जापान के साथ हाथ मिलाकर अलग से “ सिल्क रुट“ बनाने की तैयारी कर रहा है मगर इससे चीन की विस्तारवादी नीति को ज्यादा फर्क नहीं पडेगा। हां, अमेरिका का ताजा स्टैंड चीन पर दबाव डालने के लिए भारत की हौसला अफजाई जरुर है।
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