निर्वाचन आयोग द्वारा वीरवार को हिमाचल प्रदेश के साथ ही गुजरात विधानसभा चुनाव की घोषणा नहीं किए जाने से कई सवाल खडे हो गए हैं। कांग्रेस को इसमें “दाल में कुछ काला“ नजर आ रहा है और जिस तरह से अंतिम समय में गुजरात की घोषणा को रोका गया, उसमें “कुछ-न-कुछ काला“ तो है। वीरवार को सुबह सरकारी विज्ञप्ति तक में यह कहा गया था कि शाम चार बजे निर्वाचन आयोग हिमाचल प्रदेश और गुजरात विधानसभा चुनाव का ऐलान करेगा। मगर चार बजे तक गुजरात निर्वाचन आयोग की घोषणा से गायब हो चुका था। निर्वाचन आयोग ने हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए एक दिन के मतदान की घोषणा के साथ बस इतना कहा कि गुजरात विधनसभा के चुनाव 18 दिसंबर तक करा लिए जाएंगे। इसी वजह हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव की वोटों की गिनती 18 दिसंबर को ही की जाएगी। हिमाचल प्रदेश और गुजरात विधानसभा की अवधि जनवरी में समाप्त हो रही है। 2012 में निर्वाचन आयोग ने चार अक्टूबर को दोनों राज्यों के विधानसभा चुनाव की एक साथ घोषणा की थी। चुनाव की घोषणा होते ही तुरंत प्रभाव से आचार संहिता लागू हो जाती है। निर्वाचन आयोग द्वारा आखिरी क्षणों में गुजरात विधानसभा चुनाव की घोषणा नहीं किए जाने के कारण राज्य में चुनाव आचार संहिता लागू नहीं होगी। इस स्थिति मे गुजरात सरकार तब तक लोक-लुभावने फैसले लेने के लिए स्वतंत्र है जब तक निर्वाचन आयोग चुनाव की घोषणा नही कर लेता। निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव के लिए लेवल प्लेइंग फील्ड बेहद जरुरी है। हिमाचल में सत्ता की प्रबल दावेदार भाजपा कांग्रेस सरकार के लोक-लुभावने फैसलों की तीखी आलोचना कर रही है और चुनाव आचार संहिता की तल्खी से प्रतीक्षा कर रही थी। गुजरात में भाजपा सरकार के लोक-लुभावने फैसलें कांग्रेस को चुभ रहे हैं और इन्हें रोकने के लिए पार्टी को चुनाव आचार संहिता की प्रतीक्षा है। माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 16 अक्टूबर के प्रस्तावित गुजरात दौरे के दृष्टिगत गुजरात विधानसभा चुनाव की घोषणा आखिरी समय रोकी गई। प्रधानमंत्री इस दौरे के दौरान गुजरात के लोगों को चुनावी सौगात दे सकते हैं। निर्वाचन आयोग के ताजा स्टैंड से “पक्षपात“ की बू आ रही है और पहली बार ऐसा लग रहा है कि निर्वाचन आयोग भी दबाव में काम करता है। अगर ऐसा है तो आम आदमी पार्टी के प्रमुख और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के इन आरोपों में वजन है कि देश में मतदान मशीनों में भी गडबडी की जा सकती है। राजनीतिक दबाव में कुछ भी किया जा सकता है। आज तक निर्वाचन आयोग की विश्वसनीयता पर कोई आंच नहीं आई है मगर पहली बार देश के जनमानस को भी लग रहा है कि निर्वाचन आयोग ने गुजरात संबंधी फैसला दबाव में लिया है। गुजरात विधानसभा चुनाव की घोषणा रोकने के लिए निर्वाचन आयोग के इस स्पष्टीकरण में कोई वजन नहीं है कि चुनाव घोषणा के बाद संबंधित राज्य में 45 दिन के भीतर मतदान कराना लाजिमी है। 2012 में निर्वाचन आयोग ने चार अक्टूबर को गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव की एक साथ घोषणा की थी मगर गुजरात में साठ दिन से भी अधिक अवधि बाद 13 और 17 दिसंबर को चुनाव कराए गए थे। वैसे हिमाचल प्रदेश में 15 नवंबर से पहले विधानसभा चुनाव कराना निर्वाचन आयोग की सामरिक विवशता है। हिमाचल प्रदेश के ऊंचाई वाले इलाके नवंबर में भारी हिमपात के कारण बंद हो जाते हैं। सर्दी में विधानसभा चुनाव कराए जाने की सूरत में विगत में इन हलकों में मई-जून में चुनाव कराए जाते थे मगर तब तक नई सरकार पदस्थ हो चुकी होती है और इसका सत्तारुढ दल को फायदा मिलता रहा है। बहरहाल, निर्वाचन आयोग की यही सामरिक विवशता हो सकती है पर अगर 2012 में 4 अक्टूबर को हिमाचल और गुजरात चुनाव घोषणा एक साथ की जा सकती है, तो 2017 में 12 अक्टूबर को क्यों नही?
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