बुधवार, 11 अक्टूबर 2017

पटाखों के बगैर भी दीपावली

दिल्ली और उसके आसपास के शहरों (एनसीआर) में दीपावली पर पटाखों की बिक्री पर  सुप्रीम कोर्ट की रोक से अधिकतर लोग नाखुश  हो सकते हैं मगर  प्रदूषण से मुक्ति के लिए यह जरुरी भी है। कोर्ट  ने दीपावली के दौरान पटाखों से फैलने वाले प्रदूषण को देखते हुए यह प्रतिबंध लगाया है। कोर्ट  ने अपनी व्यवस्था में कहा है कि वह इस बात का पता लगाना चाहता है कि पटाखों के बगैर दिल्ली और उसके आसपास के  शहरों में प्रदूषण का स्तर कितना रहता है। हर साल दीपावली के बाद दिल्ली में प्रदूषण बेहद खतरनाक स्तर को पार कर जाता है। पिछले साल दीपावली के अगले दिन दिल्ली में प्रदूषण का स्तर अन्य दिनों के मुकाबले 42 गुना ज्यादा था। 2015 में दिल्ली में दीपावली के बाद प्रदूषण  का स्तर सुरक्षित लेवल से छह गुना  ज्यादा था।  इससे दिल्ली और आसपास के शहरों के लोगों, खासकर बच्चों और बुजुर्गों, की सेहत पर बहुत बुरा असर पड रहा है। कोर्ट  के ताजा फैसले का रोचक पहलू यह है कि दीपावली के दौरान पटाखे फोडने पर कोई प्रतिबंध नहीं है। लोग-बाग बाहर से पटाखे खरीदकर या पहले से खरीदे  पटाखे फोड सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने एक माह पहले 12 सितंबर को दिल्ली तथा उसके आसपास के शहरों में पटाखों की ब्रिकी पर लगा प्रतिबंध उठा दिया था। कोर्ट  के ताजा फैसले से पटाखा बिक्रेताओं की रोजी-रोटी पर बहुत बुरा असर पड सकता है। पिछले महीने प्रतिबंध के हटते ही पटाखा बिक्रेताओं ने त्योहारी सीजन के लिए पर्याप्त स्टॉक जमा कर लिया था। 12 सितंबर तक ही दिल्ली में 50 लाख टन पटाखों का स्टॉक था। प्रतिबंध हटते ही काफी ज्यादा स्टॉक जमा हो चुका है। इस स्थिति में देश  की शीर्ष  अदालत की चिंता वाजिब है। 2015 में दिल्ली के तीन बच्चों ने अपने परिजनों के जरिए बढते प्रदूषण के खिलाफ  सुप्रीम कोर्ट मे याचिका दायर कर “खुली हवा में सांस लेने“ का अपना अधिकार मांगा था। देश  का संविधान बच्चों को खुली हवा में सांस लेने का अधिकार देता है मगर दिल्ली में प्रदूषण का स्तर बहुत ज्यादा है और इससे उनका यह अधिकार छीना जा रहा है। बच्चों की याचिका पर पिछले साल 11 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों की ब्रिकी पर रोक लगा दी थी मगर इस साल 12 सितंबर को इसमें छूट दी गई। इस छूट के खिलाफ तीनों बच्चे फिर सुप्रीम कोर्ट  पहुंचे और सोमवार को फिर प्रतिबंध लगा दिया गया। पटाखा बिक्रेता भी कोर्ट से राहत की मांग कर सकते हैं। बहरहाल, अब समय आ गया है कि लोगों को इस बात पर विचार करना चाहिए कि सेहत ज्यादा मूल्यवान है या पटाखे फोडकर क्षण भंगुर  संतुष्टि । समय के साथ-साथ हर चीज का महत्व और प्रासंगिकता बदल जाती है। जो बातें प्राचीन भारत अथवा बैलगाडी के युग में प्रासंगिक थी, जरुरी नही है कि वे आज भी वैसी ही मह्त्वपूर्ण  हों। बढ्ती आबादी, शहरीकरण और वाहनों की संख्या ने हमारी जीवनशैली और सामयिक परिवेश  को बहुत ज्यादा बदल डाला है। समय की मांग है कि त्यौहारों पर पटाखे फोडने की रीत को छोड दिया जाए। पटाखों पर पानी की तरह पैसा बहाने की क्या जरुरत? देश  इस मामले में पहले भी पहल कर चुका है। होली पर अब जहरीले रंगों की जगह इको फ्रंडली रंगों का प्रचलन बढा है। फिर प्रदूषण फैलाने वाले पटाखों से मुक्त दीपावली क्यों नही?ं़ इसके लिए तमिल नाडु के इरोड गांवों से सीख ली जा सकती है। 1996 में पक्षी विहार की स्थापना के बाद से इरोड के 8 गांव ने आज तक पटाखे नहीं फोडे ताकि हवा साफ-सुथरी रहे और पक्षियों के मुक्त आवागमन में कोई खलल न पडे। अगर तमिल नाडु के गांववाले मिसाल पेश  कर सकते हैं, तो दिल्ली और एनसीआर के लोग भी ऐसा कर सकते हैं। सिर्फ  दृढ निश्चय   और इच्छा शक्ति की दरकार है। दीपावली रोशनी से अंधकार को मिटाने का पर्व  है, प्रदूषण फैलाकर जीवन को अंधकारमय करने का जरिया नहीं है।