देश के समक्ष मुंह फैलाए खडे ज्वलंत मुद्दों को अगर सियासी चश्मे से देखा-परखा जाए, तो इनका भटक जाना स्वभाविक है। कश्मीर समस्या को लेकर पिछले सात दश कों से यही हो रहा है। सत्तारुढ दल हो या विपक्ष, सभी ने कश्मीर समस्या को राजनीतिक चश्मे से नापा है और निहित सियासी हितों के लिए भुनाया है। कश्मीर के लिए इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व निदेशक दिनेश्वर शर्मा को वार्ताकार नियुक्त करने के एक सप्ताह के भीतर ही काग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम और प्रधानमंत्री के बीच वाद-विवाद ने वार्ता की पहल का माहौल बिगाड दिया है। पी चिदंबरम का कथन है कि कश्मीर आजादी नही, अलबत्ता स्वायत्तता मांग रहा है। इस बयान की भर्त्सना करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का कहना है कि कांग्रेस पाकिस्तान की भाषा बोल रही है जबकि पार्टी ने पूर्व गृह मंत्री के बयान से तुरंत किनारा कर लिया था। कांग्रेस में चिदंबरम को बेबाक नेता माना जाता है और वे अक्सर कुछ-न-कुछ ऐसा कह देते हैं, जिससे भाजपा लाल-पीली हो जाती है। प्रधानमंत्री अपनी जगह सही है। चिदंबरम को मौके की नजाकत समझनी चाहिए थी और उन्हें कश्मीर में शांति बहाली के लिए काम करना चाहिए। बहरहाल, चिदंबरम कश्मीर के लिए जिस स्वायत्तता की मांग कर रहे हैं, वह सियासत की चाशनी में सरोबर है। तो क्या पूर्व गूहमंत्री यह कह रहे हैं कि कश्मीर को कोई स्वायत्तता नहीं मिली हुई है? अगर ऐसा है तो कांग्रेस अथवा संप्रग सरकार ने क कश्मीर को मुंहमांगी स्वायतता क्यों नहीं दी? आजादी के बाद अब तक सात दशक में छह दशक तक कांग्रेस केन्द्र में सत्ता में रही है। चिदंबरम जी आप जब गूहमंत्री थे, तब कश्मीर को और अधिक स्वायत्तता क्यों नहीं दी गई? समकालीन नेताओं का इस तरह का आचरण देश के लिए अहितकारी है । सत्ता में रहते हुए जिन मुद्दों को वे दबा जाते हैं, सत्ता से बाहर आते ही उन्हें खूब उछालते हैं। कश्मीर के हालात मात्र स्वायत्तता से नहीं, अलबता कुशासन से बिगडे हैं। और राज्य में कुशासन के लिए कांग्रेस ही नहीं, वर्तमान भाजपा-पीडीपी सरकार में भी जिम्मेदार है। सात दशक के कुशासन और लंबे समय से जारी हिंसा के माहौल ने कश्मीर के अवाम को बागी बना दिया है। और जैसे-जैसे समय गुजर रहा है, वैसे-वैसे हालात और बिगड रहे हैं। कश्मीर को स्वायत्तता नहीं, बल्कि शांति और विकास की दरकार है। कश्मीर को पहले ही अन्य राज्यों की तुलना में खासी स्वायत्तता मिली हुई है। संविधान के अनुच्छेद 370 में कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा और सर्वाधिक स्वायत्तता मिली हुई है। यह अनुच्छेद संविधान का अभिन्न हिस्सा है। 35 ए के तहत राज्य सरकार को अपने स्थाई नागरिकों के लिए विशेष सुविधा देने और उनका स्टेट्स तय करने की पॉवर है। अन्य किसी भी राज्य को न तो इस तरह की स्वायतता है और न ही अधिकार । 35 ए की व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पहले ही सुनवाई चल रही है। मूल संविधान में यह व्यवस्था नहीं है। इसे बाद में जोडा गया है। आजादी के बाद भारत हिस्सा बनते ही कश्मीर में पाकिस्तान समर्थक अलगाववादी नेता सक्रिय हो गए थे और उतरोत्तर और ज्यादा सक्रिय होते गए। उन्हें सक्रिय रखने में केन्द्र और राज्य सरकार का भरपूर योगदान रहा है। सरकार अलगाववादियों की सुरक्षा व्यवस्था को चॉक-चौबंद करने के अलावा उनकी मेहमान नवाजी भी करती है। अलगाववादियों को पाकिस्तान समेत बाहरी मुल्कों से भी बराबर भारी-भरकम वित्तीय मदद मिल रही है। इस सच्चाई से केन्द्र और राज्य सरकार अच्छी तरह वाकिफ है। चिदंबरम से पूछा जाना चाहिए कि संप्रग सरकार ने देशद्रोही अलगाववादियों पर क्यों कार्रवाई नहीं की? पूरा देश आज यही कहेगा कृपया कश्मीर पर खामख्वाह की राजनीति करके समस्या को और न उलझाएं। अशांत घाटी को कश्मीर शांत करने के लिए मिलकर सतत प्रयास करने की जरुरत है।
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