मंगलवार, 3 अक्टूबर 2017

Where Is Clean India

आजादी के सात दशक बाद भी भारत  का खुले में  शौच -मुक्त न होना वाकई ही दुखद है। देश  के लिए यह सौभाग्य की बात है कि प्रधानमंत्री ने स्वच्छता मिशन को घर-घर पहुंचाने का बीडा उठाया है। 2014 में प्रधानमंत्री का पदभार ग्रहण करने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गांधी जयंती पर “स्वच्छ भारत“ मिशन का शुभारंभ किया था। तीन साल बाद 2017 में इसके सुखद परिणाम देखे जा सकते हैं। इन तीन साल में देश  को भले ही पूरी तरह से “ खुले में शौच -मुक्त“ की समस्या से निजात नहीं मिल पाई है, मगर अवाम की सोच में बडा बदलाव जरुर आया है। खासकर, महिलाओं में इसके प्रति जागरुकता और इसे सफल बनाने का दृढ निश्चय   पनपा है। इसीलिए, देश  में आए दिन किसी युवती द्वारा शौचालयरहित परिवार में ब्याह न करने, शादी  के लिए घर में शौचालय बनाने की  शर्त  रखने के समाचार सुनने को मिल रहे हैं। दो दिन पहले बिहार में एक विवाहिता द्वारा शौचालय के लिए अपने ससुर को थाने में घसीटने का समाचार प्रकाशित हुआ था । इससे पता चलता है कि देश  को स्वच्छ रखने के प्रति लोगों की सोच में अब कितना बदलाव आया है। मगर अभी  काफी  कुछ करना बाकी है । स्वच्छता मिशन के तीन साल पूरे होने पर सोमवार को प्रधानमंत्री ने कहा  “हजार गांधी, लाख मोदी और मुख्यमंत्री“ भी भारत को तब तक खुले में शौच   मुक्त नहीं कर सकते जब तक  125 करोड भारतवासी खुद इसका बीडा न उठा लें। देश  को एकदम चका-चक  स्वच्छ बनाने के लिए हर देशवासी को अपनी सोच बदलनी होगी और स्वच्छता को अपनी दिनचर्या बनाना होगा। इसके लिए हमें विदेशियों से सीखने की भी जरुरत है। क्या कभी किसी सभ्य समाज  अथवा विकसित मुल्कों के  नागरिक को सडक पर केले का छिलका, वेस्ट या गंदगी फेंकते देखा है? स्वच्छता के प्रति  पश्चिम  के लोग इतने सजग और संजीदा होते हैं कि वेस्ट फेंकने के लिए सडक पर दूर तक कूडादान (डस्टबिन) की तलाश  करेंगे और  कूडा इसमें ही डालेंगे। बीबीसी की एक रिपोर्ट  में कहा गया है  कि भारत की 49.8 फीसदी आबादी खुले में शौच  करती है। केवल  46.9 फीसदी आबादी के पास शौचाालय की सुविधा और मात्र  3.2 फीसदी लोग ही पब्लिक  शौचालय का इस्तेमाल करते हैं। भारत में लोगो के पास मोबाइल है मगर शौचालय सुविधा नहीं। यह स्थिति बेहद दुखद है।  स्वच्छता प्रगति और स्मृद्धि का प्रतीक है और स्वच्छता को अपनी दिनचर्या नहीं बनाने वाला समाज और उसके घटक प्रगति के बावजूद पिछडे ही माने जाएंगे। भारत में आज भी यह सोच व्याप्त है कि साफ-सफाई  किसी और की जिम्मेदारी है। घर के भीतर “मां“ की और घर के बाहर सफाई कर्मियों की। बीच सडक थूकना अथवा गंद्गी फेंकना, अपने घर की गंदगी को बाहर नाली अथवा सडक पर फेंक देना और  खुले में सोच करना तो जैसे भारत में हर नागरिक का जन्म   सिद्ध अधिकार है। इसी मानसिकता को दूर करने के लिए  राष्ट्रपिता   महात्मा गांधी ने “स्वच्छता को अपनी दिनचर्या का अहम हिस्सा बना रखा था। वे और उनके सहयोगी खुद अपने शौचालय की साफ-सफाई करते और दूसरों को भी ऐसा करने की प्रेरणा देते। साफ-सफाई के लिए दूसरों पर आश्रित रहना सभ्य समाज की मान्यताओं के खिलाफ है। गांधी जी का मानना था कि भारत में  आंचलिक क्षेत्रों में ही नहीं, अलबता शहरी क्षेत्रों की मलीन और संकरी बस्तियों को भी स्वच्छ रखना निहायत अरुरी है। घर-बार, आस-पडोस स्वच्छ रहेगा तो देष भी सेहतमंद और रोग मुक्त रहेगा। दुनिया में आधे से ज्यादा रोगों के लिए गंदगी और इसमें पलने-बढने वाले मच्छर जिम्मेदार है।  आजादी के सात दशक बाद भी देश  से गंदगी  जनित रोगों का उन्मूलन नहीं किया जा सका है, जबकि सरकार इनके उन्मूलन पर अरबों रुपए खर्च  कर चुकी है। प्रधानमंत्री मोदी स्वच्छता के प्रति लोगों की सोच में बदलाव लाने के लिए काबिलेतारीफ हैं। मगर उनका यह मिशन तभी पूरा होगा जब देश  का हर नागरिक स्वच्छता अपनी दिन-चर्या  का अहम हिस्सा बनाए।