मंगलवार, 17 अक्टूबर 2017

गुरदासपुर से दिल्ली तक

पंजाब में गुरदासपुर लोकसभाई सीट के उप-चुनाव में  काग्रेस की तगडी जीत से पार्टी के शीर्ष  नेता भी फूले नहीं समा रहे हैं। अमूमन, अपवाद को छोडकर उप-चुनाव में सत्तारूढ दल के उम्मीदवार के जीतने की परंपरा रही है। पंजाब में इसी साल के शुरु में कांग्रेस भारी बहुमत से विधानसभा चुनाव में अपना परचम लहरा चुकी है। मतदाताओं का सरकार से “हनीमून“ अभी चल रहा है। राज्य में अमरेन्द्र सिंह सरकार ने किसानों के कर्ज  माफी समेत कई लोक-लुभावने फैसले भी लिए हैं। सरकार की अब तक परफोर्मेंस भी काफी संतोषजनक रही है। इन हालात में कांग्रेस को हरा पाना शिअद-भाजपा गठबंधन के बूते की बात नहीं थी।  मगर कांग्रेस प्रत्याशी  सुनील झाखड की भाजपा के प्रत्याशी  पर दो लाख मतों के भारी अंतर से जीत वाकई ही अप्रत्याशित है। आज तक कांग्रेस इस सीट से कभी भी इतने भारी मतों के अंतर से जीत नहीं दर्ज  कर पाई थी। इतना ही नही “कांग्रेस के पक्ष में बही चुनावी बयार“ में  आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार की जमानत तक जब्त हो गई। गुरदासपुर लोकसभाई उपचुनाव के नतीजों ने दीवारों पर साफ साफ इबादत लिख दी है कि ग्रांड ओल्ड पार्टी कांग्रेस का जलवा अभी भी कायम है, भले ही यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पक्ष में चली 2014 की लहर में कुछ समय के लिए दब गया था। नव निर्वाचित सांसद सुनील झाखड के इस आकलन  को नकारा नहीं जा सकता कि  गुरदासपुर हो या   दिल्ली यूनिवर्सिटी के   छात्र संघ चुनाव  या पंजाब  और राजस्थान यूनिवर्सिटी के चुनाव , कांग्रेस और इससे संबंद्ध एनएसयूआई की जीत से साफ संकेत है कि चुनावी बयार कांग्रेस के पक्ष में बह रही है। तथापि दिल्ली अभी काफी दूर है और पंजाब की एक लोकसभाई सीट और छात्र संघों के चुनाव से दिल्ली तक का सफर तय नहीं किया जा सकता। इसके लिए कांग्रेस को तरह-तरह के पापड बेलने पडेंगे। नवंबर-दिसंबर में हिमाचल प्रदेश  और गुजरात के विधानसभा चुनाव कांग्रेस और भाजपा की दशा   और दिशा   तय करेंगे। गुजरात में 15 साल से भाजपा सत्ता में है और हिमाचल प्रदेश  में कांग्रेस पांच साल से सत्ता में है। राज्य के मुख्यमंत्री  वीरभद्र सिंह के लिए अपनी लोकप्रियता दिखाने का यह अंतिम अवसर है।  छह बार राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके वीरभद्र सिंह आज तक पार्टी को लगातार दूसरी बार बहुमत नहीं दिला पाए हैं। इसके विपरीत गुजरात में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राज्य में भाजपा को लगातार तीन बार भारी बहुमत से सत्ता में ला चुके हैं। गुजरात काग्रेस के लिए बडी चुनौती है और पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी राज्य के फतेह करने के लिए दिन-रात एक कर रहे हैं। नोटबंदी और जीएसटी ने गुजरात के कारोबारियों की कमर तोडकर रख दी है। कारोबारी अब तक भाजपा के पक्के समर्थक रहे हैं मगर इस बार यह तबका भाजपा से क्षुब्ध लग रहा है। बेरोजगारी से युवा परेषान है और  दलितों  और अल्पसंख्यकों पर हो रहे  गौरक्षकों के जुल्म से ये तबके भी भाजपा से छिटक रहे हैं। भाजपा को सबसे बडी चुनौती हार्दिक पटेल, दलित और ओबीसी फ्रंट से है। अगर ये तीनों फ्रंट भाजपा के खिलाफ जाते हैं, तो पार्टी को चुनाव में खासी परेशानी हो सकती है। पहली बार भाजपा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गुजरात में फ्रंट फुट की जगह बैक फुट पर खेलते नजर आ रहे हैं। उत्तर प्रदेश  के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को गुजरात के चुनाव प्रचार में झोंकना यही संदेश  दे रहा है कि भाजपा को प्रधानमंत्री  के अलावा भी लोकप्रिय चेहरों की दरकार है। बहरहाल, गुरदासपुर की जीत से हिमाचल प्रदेश  और गुजरात के कांग्रेस कार्यकर्ताओं का  मनोबल बढना स्वभाविक है। गुजरात में भाजपा अभी से “मोदी के गौरव“ की बात कर रही है। प्रधानमंत्री सोमवार को गुजरात के चुनावी दौरे पर थे और इस दौरान उन्होंनें कांग्रेस को जी भर कोसा मगर प्रमुख मुद्दों का बहुत कम उल्लेख किया। इससे चुनावी बयार का कुछ-कुछ अनुमान लगाया जा सकता है।