गुरुवार, 6 जुलाई 2017

कहां है एक राष्ट्र , एक टैक्स ?

पहली जुलाई, 2017 से लागू गुडस एंड सर्विसेज टैक्स से क्या पूरे देश  में एक समान टैक्स दरें हैं? और क्या जीएसटी से “एक राष्ट्र , एक टैक्स“ का सपना साकार हो गया है। प्रधानमंत्री द्वारा परिभाषित गुड एंड सिंपल टैक्स को लेकर आम व्यापारी के मन में अभी भी कई  शंकाएं हैं। सबसे गहरी  शंका टैक्स के चार स्लैब को लेकर है। सरकार ने 5, 12, 16 और 28 फीसदी की चार दरें तय की है मगर अधिकतर वस्तुओं और सेवाओं को 12 एवं 18 फीसदी जीएसटी के दायरे में रखा गया है। एक हजार से अधिक  वस्तुओं और सेवाओं की दरें तय हो गई हैं मगर पेट्रोलियम, बिजली, शराब और रियल एस्टेट को जीएसटी में  शामिल नहीं किया गया। पेट्रोलियम पदार्थ , बिजलौ और शराब की भारत में सबसे ज्यादा खपत होती है। अब सवाल यह है कि आम आदमी से जुडी इन अहम वस्तुओं अथवा सेवाओं  को जीएसटी से बाहर क्यों रखा गया है। और अगर इन चीजों को जीएसटी से बाहर ही रखना था तो “एक राष्ट्र , एक टैक्स “ का दावा क्यों किया जा रहा है। भला यह भी कोई बात हुई कि चंडीगढ जैसे ट्राईसिटी में पेट्रोल के अलग-अलग दाम हों। दिल्ली में  पेट्रोल-डीजल  जिस दाम पर मिलेगा, जयपुर, लखनऊ, पटना अथवा मुंबई में उस पर नहीं मिलेगा। दिल्ली में बिजली दरें कुछ होंगी तो गुरुग्राम- फरीदाबाद में कुछ और। दिल्ली में  शराब के जो दाम होंगे मगर  नोएडा अथवा चंडीगढ में वह नहीं होंगे। राज्यों की असहमति के कारण यह स्थिति बनी है। दरअसल, शराब  और पेट्रोलियम पदार्थों पर  लगने वाली आबकारी ड्यूटी और रीयल इस्टेट की स्टांप डयूटी से राज्यों को भारी-भरकम राजस्व आता है। इसलिए राज्य इन वस्तुओं को जीएसटी के दायरे में लाने के लिए कतई तैयार नहीं थे।  रीयल एस्टेट और शराब में सबसे ज्यादा काला धंधा होता है। इस स्थिति में इन्हें जीएसटी से बाहर रखने का मतलब है काले धन को फलने-फूलने की पूरी छूट देना। इन चार चीजों को जीएसटी से बाहर रखने की राज्यों की मांग का माना जाना केन्द्र की कमजोरी बताई जा रही है। शराब को जीएसटी से बाहर रखे  जाने के साफ-साफ अर्थ  हैं कि केन्द्र और राज्यों की सरकारें शराब माफियों के आगे नतमस्तक हो गई हैं। इससे शराब को मिलने वाली छूट भी जारी रहेगी। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि शराब और रीयल एस्टेट का जीएसटी के दायरे में लाए जाने से  काले धन पर नियंत्रण किया जा सकता था मगर समकालीन सरकार ने बहुत बडा मौका गंवा दिया है। पूंजीपतियों को  खुश  करने के लिए सरकार ने बिजली और पेट्रोलियम पदार्थों को भी जीएसटी से बाहर रखा है। बिजली  और  पेट्रोलियम का तेजी से निजीकरण किया जा रहा है। इस बात के मद्देनजर  सरकार पूंजीपतियों से टकराव नहीं चाहती है। हैरानी इस बात की है कि गरीबों के लिए विशेष  रुप से खोले गए जन-धन खाते को चलाने के लिए खाताधारियों को आठ फीसदी  सर्विस टैक्स देना होगा। और तो और जीएसटी के बाद घरेलू एलपीजी सिलेंडर भी 32 रु महंगा हो गया है। इसके विपरीत  शिक्षा पर कोई जीएसटी नहीं लगाया गया है जबकि निजी स्कूल्स मोटा मुनाफा कमा रहे हैं। जीएसटी से छोटे कारोबारियों को भी कोई फायदा नहीं होगा। अमूमन, कारोबारी स्थानीय मार्केट से ही माल खरीदता है और अपना उत्पाद भी वहीं बेचता है। इस स्थिति में छोटे कारोबारियों को कोई फायदा नहीं होगा। इस सच्चाई को भी सभी जानते हैं कि जीएसटी को लागू करने के लिए विदेशी  निवेशकों का भारी दबाव था। विदेशी  कंपनियां अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग टैक्स से खासी परेशान थी। जीएसटी से विदेशी  कंपनियों को सबसे ज्यादा फायदा होगा। बहरहाल, जीएसटी लागू  होने के बावजूद “ एक राष्ट्र , एक टैक्स“ व्यवस्था लागू नहीं हो पाई है।