जीत के एकदम करीब पहुंच कर हार जाना बेहद कष्टदायक होता है और इससे भी ज्यादा पीडादायक होता है इस तरह की हार के अपमान का घूंट पी जाना। रविवार को इंग्लैंड में क्रिकेट के “मक्का“ लार्डस में आईसीसी क्रिकेट वर्ल्ड कप कप के फाइनल में भारत का इंग्लैंड से मात्र आठ रनों से हार जाना काफी दुखदायी है। चालीस साल के महिला क्रिकेट वर्ल्ड कप के इतिहास में भारत को दूसरी बार विश्व चैंपियन बनने का सुनहरा मौका मिला था। सेमी-फाइनल में भारत ने जिस तरह छह बार की चैंपियन आस्ट्रेलियाई पर शानदार जीत दर्ज की थी और टूर्नामेंट के पहले ही मैच में इंग्लैंड को 35 रनों से हराया था, उससे भारत के विश्व चैंपियन बनने की पूरी उम्मीद थी। फाइनल में सधी हुई गेंदबाजी कर भारत ने इंग्लैंड की बल्लेबाजों को खुलकर शॉट्स लगाने का मौका नहीं दिया। इंग्लैंड की टीम 50 ओवर्स में 228 रन ही बना पाई। इसके जवाब में भारत ने 42.4 ओवर्स में तीन विकेट गंवाकर 191 रन बना लिए थे। जीत के लिए टीम इंडिया को 44 गेंदों में 38 रनों की दरकार थी और तब लग रहा था कि भारत आसानी से जीत जाएगा। स्टेडियम में मौजूद भारतीय दर्शक जीत का जश्न मनाने की तैयारियां कर चुके थे। मगर आखिर गेंद तक रोमांचक खेल क्रिकेट अनिश्चतता से भरा होता है। 43वें ओवर के बाद ऐसा हुआ जिसकी भारत ने कल्पना तक नहीं की थी। भारत की बाकी सात खिलाडी महज 28 रन के अंदर पैवेलियन लौंट गईं। तीन खिलाडी तो खाता तक नहीं खोल पाईं। आखिरी तीन ओवर्स में भारत को 14 रन बनाने थे और उसके तीन विकेट बचे थे। और अगर बल्लेबाज एक-एक रन भी बटोरते, तो भी भारत आसानी से जीत जाता। मगर ऐसा नहीं हुआ। बडे शॉट्स लगाने के चक्कर में बाकी तीन बल्लेबाज भी पैवेलियन लौंट गईं। इग्लैंड की सीमर एन्या श्रुबसोल ने छह विकेट झटककर भारत से जीत छीन ली। भारतीय बल्ले बाज गेम के अंतिम क्षणों का दवाब झेल नहीं पाई और जीत के करीब आकर आठ रन से हार गईं। भारतीय टीम की कप्तान मिताली राज ने माना है कि भारत नाजुक क्षणों के प्रेशर को झेल नहीं पाया। भारत की हार का सबसे बडा कारण इसके मिडल आर्डर बल्लेबाजों का फ्लॉप रहना था। कप्तान मिताली ने लापरवाही से रन आउट होकर अपना विकेट गंवा दिया। स्मृति मंधाना बिना खाता खोले आउट हो गई। भारतीय टीम की फील्डिंग बेहद कमजोर रही। इंग्लैंड की बल्लेबाज स्काइवर को जीवनदान देना महंगा पडा। बहरहाल, खेल में हार-जीत तो होती ही रहती है। इस विश्व कप में भारतीय महिला टीम का शुरु से शानदार प्रदर्शन रहा। पहले ही मैच में इंग्लैंड को हराया और सेमी-फाइनल में मजबूत आस्ट्रेलिया को। फाइनल हार जाने के बावजूद भारतीय महिला टीम पूरे टूर्नामेंट में छाई रहीं। भारत को इस हार से सबक लेनी चाहिए और टीम को नाजुक क्षणों मे दबाव झेलने के लिए तैयार किया जाना चाहिए। पिछले तीन दशकों के दौरान महिला क्रिकेटरों को खासा प्रोत्साहन मिल रहा है। अब महिला क्रिकेटरों को भी पांच सितारा होटलों में ठहरने की सुविधा, चमचमाती पोशाक, विदेशी लीग मैचों में खेलने के अवसर और जीतने पर ढेरों इनाम मिलते हैं। शोहरत अलग से। मगर अस्सी के दशक में ऐसा नहीं था। तब महिला क्रिकेटरों को टेस्ट मैच खेलने के लिए मात्र एक हजार रु मिलते थे। टीए-डीए तक नहीं मिलता था। महिला क्रिकेट में तब पैसे की चमक-दमक भी नहीं थी। और न ही महिला क्रिकेट मैच के प्रति आज जैसा क्रेज था। रविवार को भारत और इंग्लैंड के बीच फाइनल मैच को दुनिया भर में टीवी चैन्लस पर लाइव दिखा जा रहा था। पहले ऐसा नही होता था। भारत के लिए यही बडी उपलब्धि है कि उसकी महिला टीम दो बार फाइनल में पहुंची है।
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