मंगलवार, 4 जुलाई 2017

महिलाओं पर अत्याचार कब तक ?

लखनऊ में गैंग-रेप पीडिता पर चौथी बार एसिड अटैक से उत्तर प्रदेश  को क्राइम फ्री बनाने के  आदित्यनाथ सरकार के दावे बौने नजर आ रहे हैं। राजधानी लखनऊ स्थित वर्किंग वूमेन हास्टल में गत शनिवार सायं गैंग रेप पीडिता छात्र पर अचानक एसिड फैंका गया। जिस जगह एसिड फैंका गया, वहां से कुछ मीटर की दूरी पर सुरक्षा गार्ड  खडा था। जाहिर है  पीडिता को आरोपियों के खिलाफ खामोश  रहने के लिए यह अटैक किया गया है।  मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस एसिड अटैक को “साजिश “ बताकर पीडिता के जख्मों पर नमक छिडका है। योगी ने लखनऊ के एक निजी चैनल से कहा कि छात्रावास की सुरक्षा व्यवस्था इतनी कडी है कि वहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता। इसके बावजूद रेप पीडिता पर एसिड  अटैक का वाक्या कैसे हो गया“? “ये घटना सचमुच की घटना है या फिर घटना के नाम पर कुछ लोग केवल बदनाम करने की साजिश  रच रहे हैं“? मुख्यमंत्री का यह बयान वाकई ही दुखद है।  रेप पीडिता अपने पर एसिड अटैक करवाकर सरकार को बदनाम करने की साजिश  रचने से रही। अपनी नाकामी छिपाने के लिए अक्सर सियासी नेता “साजिश “ का सहारा लेते हैं।  पीडित महिला को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। पीडिता लखनऊ के एक कैफे मे काम करती है जो एसिड अटैक पीडितों द्वारा चलाया जा रहा है।  2009 में गैंग रेप के बाद  पिछले आठ सालों में पीडिता पर कई बार एसिड अटैक किया जा चुका है। इस साल मार्च में अपने गांव से लखनऊ लौटते समय ट्रेन में दंबगों ने पीडिता के गले में बलपूर्वक एसिड डाल दिया था। तब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पीडिता का अस्पताल में कुशलक्षेम भी पूछा था और मुआवजा भी दिया था। पीडिता दो बच्चों की मां है। गैंप रेप पीडिता पर ताजा एसिड अटैक देश  में महिलाओं की बदहाली को बयां करता है। मां-बेटियों की सरेआम अस्मत लूटना तो जैसे दबंगों का शौक बना हुआ है और कानून भी इनका कुछ नहीं बिगाड सकता। बलात्कारियों की दबंगई से अक्स पीडिता और उसके परिजन डर जाते है। जो डरते नहीं है, उनका लखनऊ की इस पीडिता जैसा हश्र होता है। गैंग रेप पीडिताएं खुली हवा में सांस लेना तो दूर, भारी सुरक्षा बंदोबस्त  में भी सांस नहीं ले सकतीं। कानून में व्याप्त खामियों का फायदा उठाकर अधिकतर बलात्कारी साफ बच निकलते हैं। भारत में न्याय प्रकिया साक्ष्यों पर आधारित है और रेप की स्थिति में न के बराबर साक्ष्य जुटाए जा सकते है़ं। सबसे बडी खामी यह है कि अक्सर दबंगों अथवा सा सामाजिक दबाव में  पीडिता नरम पड जाती है।  भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 326ए के तहत एसिड अटैक करने वाले को उमर कैद की सजा का प्रावधान है। 2013 में  पहली बार एसिड अटैकर के लिए अलग से  326बी कानून बनाया गया है। तथापि दबंगई बलात्कारियों के लिए यह कानून भी नाकाफी है।  एसिड अटैक के 85 फीसदी से भी ज्यादा मामले महिलाओं से संबंधित होते हैं। आंकडों के अनुसार 2010 से 2014 के दौरान 60 फीसदी मामलों में एक साल तक भी अदालत में चार्जशीट तक दाखिल नही हुई थी। 81 फीसदी एसिड अटैक आरोपियों को तुरंत जमानत मिल जाती है़। 49 फीसदी गायब होकर कानून को ठेंगा  दिखाते हैं।  महिला से गैंग रेप करने के बाद उस पर एसिड अटैक करना अत्याधिक जघन्य अपराध है और यह कृत्य मानवीय संवेदना की तमाम सींमाएं लांघ जाता है। ऐसे अपराधियों को कानून में कडी से कडी और त्वरित सजा का प्रावधान होना चाहिए। भारत में एसिड की सहज उपलब्धता भी एसिड  अटैक को आसान बना देता है। देश  में डाक्टर की प्रिस्क्रिपन के बगैर दवाएं मिल जाती हैं तो एसिड का मिलना कोई मुश्किल  काम नहीं है। नूडल्स की तरह एसिड बिकता है।  2013 के कानून की एसिड की उपलब्धता के लिए नियम तो बनाए गए हैं मगर इन पर कडाई से अमल नहीं होता है। महिलाओं को त्वरित न्याय मिले, सरकार को कानून में व्याप्त खामियों को अविलंब दूर करना चाहिए।