मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर के सात अलगाववादी (असल में आतंकी) हुर्रियत नेताओं को गिरफ्तार करके वाकई ही साहस का परिचय दिया है। हुर्रियत और अन्य अलगाववादी नेता नमक भारत का खाते हैं मगर हलाली पाकिस्तान की करते हैं। सोमवार को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने हुर्रियत के शीर्ष नेता सैयद अली शाह गिलानी के जवांई अल्ताफ अहमद शाह उर्फ अल्ताफ फंटूष समेत सात को हिरासत में लिया और उन्हें पूछताछ के लिए दिल्ली ले जाया गया। इनमें छह को श्रीनगर से गिरफ्तार किया गया और एक को दिल्ली से। इन सभी पर आरोप हैं कि उन्हें कश्मीर घाटी में हिंसा फैलाने, सरकारी संपति को करने और स्कूलों एवं अन्य संस्थानों को जलाने के लिए लश्कर के प्रमुख आतंकी हाफिज सईद से पैसा मिलता है। इसी साल मई में एनआईए ने तीन अलगाववादी नेताओं को दिल्ली बुलाकर उनसे कडी पूछताछ की थी। तब इन नेताओं ने एनआईए को बताया था कि उन्हें कश्मीर में आतंक फैलाने के लिए पाकिस्तान की आईएसआई और अन्य आतंकी संगठनों से भरपूर आर्थिक मदद मिलती है। मई में ही एनआईए ने तहरीक-ए-हुर्रियत और जेकेएलएफ के नेताओं से श्रीनगर में लगभग चार घंटे लगातार पूछताछ की थी और इनसे हवाला चैनलो के जरिए अलगाववादी और आतंकियों की फडिंग के सुराग मिले थे। एनआईए अब तक तेरह अलगाववादी नेताओं के खिलाफ सबूत जुटा चुकी है। इस स्थिति में हुर्रियत के कुछ और नेताओं की गिरफ्तारी भी हो सकती है। बहरहाल, कश्मीर में लंबे समय से जारी आतंक और हिसा के दौर के मद्देनजर सात दोयम दर्जे के अलगाववादी नेताओं की गिरफ्तारी “ऊंट के मुह में जीराः समान लग रही है। गिरफ्तार करना ही तो सैयद गिलानी, मीरवाइज उमर फारुक और यासीन मलिक को करें। अगर गिलानी का दामाद, मीरवाइज गुट अथवा जेकेएलएफ के अदने नेता कश्मीर में आतंक फैलाने के लिए पाकिस्तान से आर्थिक मदद ले रहे हैं, तो उनके आकाओं गिलानी, मीरवाइज फारुक और कट्टर पाकिस्तानी समर्थक यासीन मलिक को क्यों बख्शा गया है? कश्मीर में 26 से अधिक अलगावादी राजनीतिक और धार्मिक संगठन सक्रिय हैं और इन सभी को सीमा पार से खुलकर आर्थिक मदद मिलती है। ये सभी संगठन पाकिस्तान द्वारा भारत के खिलाफ चलाए जा रहे “प्रॉक्सी वार“ का अहम हिस्सा है। नब्बे के दशक में कश्मीर में सुरक्षा एजेंसियों द्वारा पाकिस्तान प्रायोजित आतंक और अलगाववादियों की कमर तोड देने के बाद जम्मू-कश्मीर में चरमपंथी बिखरने की कगार पर थे। तत्कालीन सबसे बडा आतंकी संगठन जेकेएलफ लगभग निष्क्रिय हो चुका था। मार्च 1993, भारत के खिलाफ मिलकर लड़ने की गर्ज से 26 अलगावादी राजनीतिक और धार्मिक संगठनों ने ऑल पार्टी हुर्रियत क्रांफेस (एपीएचसी) बनाया। तब माना गया कि पाकिस्तान की शह पर अमेरिका के थिंक-टैंक रॉबर्ट ओकले के संगठन यूएस इंस्टीट्युट ऑफ पीस (यूएसआईपी) ने एपीएचसी को गठित करवाने में अहम भूमिका निभाई थी। बाद की घटनाओं ने इस बात की पुष्टि भी की थी। ओकले पाकिस्तान में अमेरिका के राजदूत रह चुके थे और उनके राजनयिक समय में अमेरिका-पाकिस्तान के द्धिपक्षीय संबंध चरम पर थे। नब्बे के दशक में सैयद गिलानी के एक हमले में जख्मी होने के बाद जब उन्हें दिल्ली के अस्पताल में भर्ती करवाया गया था, अमेरिकी एबेंसी के नुमाइंदे हर रोज उनका कुशलक्षेम लेने अस्पताल आते थे । इतना सब होने के बावजूद भी केन्द्र और राज्य सरकार हुर्रियत नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करने की बजाए उन्हें पालती रही है। सरकार अलवागवादी नेताओं की सुरक्षा, विदेशी यात्राओं और अन्य सुविधाओं पर सालाना सौ करोड रु से अधिक खर्च कर रही है। ऐसा किसलिए? यह पैसा कश्मीर की अवाम को मिलना चाहिए था। अवाम “ कश्मीर की काली भेडो“ं को बखूबी पहचानती है। मंगलवार को अलगाववादियों के बंद को मिला फीका रिस्पांस इस बात का प्रमाण है। अब समय आ गया है कि कश्मीर को भारत से अलग करने की साजिश रचने वालों को जेल में बंद किया जाए।
बुधवार, 26 जुलाई 2017
सैयद गिलानी ,यासीन मालिक, मीरवाइज को गिरफ्तार करें तो जाने
Posted on 8:55 pm by mnfaindia.blogspot.com/






