बिहार में पिछले कई दिनों से जारी सियासी ड्रामे का बुधवार को पटाक्षेप हो ही गय। इस नाटक का स्क्रिप्ट पिछले साल ही लिखा जा चुका था और लगातार रिहर्सल की जा रही थी। नीतिश को अधिक विश्वसनीय सहयोगी पार्टी की दरकार थी और भाजपा को बिहार जैसे महत्वपूर्ण राज्य की। इसीलिए नीतिश कुमार को भ्रष्टाचार पर “जीरो टोलरेंस याद आ रहा था। लालू प्रसाद परिवार के खिलाफ बेनामी संपत्ति जांच से नीतिश को गठबंधन तोडने का बहाना मिल गया। अतंत; लालू प्रसाद की राजद और कांग्रेस के साथ विधानसभा चुनाव की बेला पर बनाए गए महागठबंधन को बाइस माह में डंप करके नीतिश कुमार ने फिर भगवा पार्टी का दामन लिया। बुधवार को महागठबंधन से पीछा छुडाने के लिए नीतिश कुमार ने पहले राज्यपाल को इस्तीफा दिया, फिर भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने का दावा किया और वीरवार सुबह होते-होते मुख्यमंत्री की शपथ भी ले ली। लालू प्रसाद एंड संस देखते ही रह गए। उन्हें सरकार बनाने का अवसर तक नही दिया गया। तेजी से घटते घटनाक्रम में केन्द्र ने नीतिश का पूरा साथ दिया। केन्द्र में सत्तारूढ भाजपा नीत सरकार इस स्क्रिप्ट का अहम हिस्सा थी, इसलिए स्टेज पहले से ही सजा ली गई थी। इधर नीतिश ने पटना में इस्तीफा दिया, उधर दिल्ली में फौरन भाजपा के निर्णायक मंडल की बैठक हुई और नीतिश के साथ मिलकर सरकार बनाने का ऐलान किया गया। संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार नीतिश कुमार द्वारा इस्तीफा दिए जाने के बाद राज्यपाल को सबसे पहले लालू प्रसाद की पार्टी को सरकार बनाने का निमंत्रण देना चाहिए था। लालू प्रसाद की पार्टी के विधानसभा में सबसे ज्यादा विधायक हैं, इस स्थिति में सरकार बनाने का न्यौता उन्हें दिया जाना चाहिए था। और अगर राज्यपाल को लगता राज्य में फिलहाल राजनीतिक अस्थिरता है, तो अल्पावधि के लिए राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करनी चाहिए थी। संवैधानिक व्यवस्था का यही तकाजा था। मगर देश में कायदे-कानून और मर्यादाओं का सम्मान कहां किया जाता है? केन्द्र में कांग्रेस की सरकार हो या भाजपा अथवा किसी और गठबंधन की, सब संविधान द्वारा प्रदत शक्तियों का खुलकर दुरुपयोग करते हैं। मोदी सरकार भी अपवाद नहीं है। पहले अरुणाचल प्रदेश , फिर उत्तराखंड और अब बिहार में मीदी सरकार ने जिस तरह से संवैधानिक व्यवस्था का हरण किया है, उससे देश का संघीय ढांचा कमजोर हुआ है। लोकतंत्र में जनादेश सर्वोपरि होता है और इसका हर हाल में सम्मान किया जाना चाहिए। कश्मीर और पूर्वोतर भारत के हालात क्या केन्द्र को इस बात का अहसास दिलाने के लिए काफी नहीं है कि अवाम की आवाज को दबाना भारत की एकता और अखंडता पर प्रहार करने जैसा है। इस तरह की कवायद से ही अवाम मुख्यधारा से छिटक जाता है। बहरहाल, बिहार में महागठबंधन से बाहर आकर भाजपा से गलबाहियां करने के लिए नीतिश कुमार काफी पहले से जमीन तैयार कर रहे थे। विधानसभा चुनाव जीतने के लिए उन्होंने राजद और कांग्रेस के साथ विवशता में महागठबंधन बना तो लिया मगर लालू प्रसाद द्वारा जब-तब बाहें मरोडना उन्हें रास नहीं आ रहा था। लालू बार-बार सार्वजनिक तौर पर सबसे बडी पार्टी होने का रौब झाडते। लालू से छुटकारा पाने के लिए नीतिश उचित अवसर की तलाश में थे। और मोदी सरकार ने लालू प्रसाद के खिलाफ बेनामी संपत्ति का मामला बनाकर नीतिश को यह मौका भी दे दिया। कहते हैं “राजनीति में न कोई स्थायी मित्र होता है और न कोई परमानेंट दुश्मन' । सत्ता के लिए नीतिश ने अपने सबसे बडे प्रतिद्धदी लालू से हाथ मिलाया और अब उसी भगवा पार्टी से मिल गए जिसे जद(यू) नेता चुनाव में सांप्रदायिक बता रहे थे। इस सारे खेल में न तो नीतिश जीते हैं और न ही लालू हारे हैं। अगर कोई हारा है तो वह है लोकतंत्र। मोदी जी बधाई हो, बिहार भी कांग्रेस मुक्त हो गया है।
शुक्रवार, 28 जुलाई 2017
Congrats Modi jee For Adding Bihar To Your Kitty
Posted on 6:25 pm by mnfaindia.blogspot.com/
बिहार में पिछले कई दिनों से जारी सियासी ड्रामे का बुधवार को पटाक्षेप हो ही गय। इस नाटक का स्क्रिप्ट पिछले साल ही लिखा जा चुका था और लगातार रिहर्सल की जा रही थी। नीतिश को अधिक विश्वसनीय सहयोगी पार्टी की दरकार थी और भाजपा को बिहार जैसे महत्वपूर्ण राज्य की। इसीलिए नीतिश कुमार को भ्रष्टाचार पर “जीरो टोलरेंस याद आ रहा था। लालू प्रसाद परिवार के खिलाफ बेनामी संपत्ति जांच से नीतिश को गठबंधन तोडने का बहाना मिल गया। अतंत; लालू प्रसाद की राजद और कांग्रेस के साथ विधानसभा चुनाव की बेला पर बनाए गए महागठबंधन को बाइस माह में डंप करके नीतिश कुमार ने फिर भगवा पार्टी का दामन लिया। बुधवार को महागठबंधन से पीछा छुडाने के लिए नीतिश कुमार ने पहले राज्यपाल को इस्तीफा दिया, फिर भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने का दावा किया और वीरवार सुबह होते-होते मुख्यमंत्री की शपथ भी ले ली। लालू प्रसाद एंड संस देखते ही रह गए। उन्हें सरकार बनाने का अवसर तक नही दिया गया। तेजी से घटते घटनाक्रम में केन्द्र ने नीतिश का पूरा साथ दिया। केन्द्र में सत्तारूढ भाजपा नीत सरकार इस स्क्रिप्ट का अहम हिस्सा थी, इसलिए स्टेज पहले से ही सजा ली गई थी। इधर नीतिश ने पटना में इस्तीफा दिया, उधर दिल्ली में फौरन भाजपा के निर्णायक मंडल की बैठक हुई और नीतिश के साथ मिलकर सरकार बनाने का ऐलान किया गया। संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार नीतिश कुमार द्वारा इस्तीफा दिए जाने के बाद राज्यपाल को सबसे पहले लालू प्रसाद की पार्टी को सरकार बनाने का निमंत्रण देना चाहिए था। लालू प्रसाद की पार्टी के विधानसभा में सबसे ज्यादा विधायक हैं, इस स्थिति में सरकार बनाने का न्यौता उन्हें दिया जाना चाहिए था। और अगर राज्यपाल को लगता राज्य में फिलहाल राजनीतिक अस्थिरता है, तो अल्पावधि के लिए राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करनी चाहिए थी। संवैधानिक व्यवस्था का यही तकाजा था। मगर देश में कायदे-कानून और मर्यादाओं का सम्मान कहां किया जाता है? केन्द्र में कांग्रेस की सरकार हो या भाजपा अथवा किसी और गठबंधन की, सब संविधान द्वारा प्रदत शक्तियों का खुलकर दुरुपयोग करते हैं। मोदी सरकार भी अपवाद नहीं है। पहले अरुणाचल प्रदेश , फिर उत्तराखंड और अब बिहार में मीदी सरकार ने जिस तरह से संवैधानिक व्यवस्था का हरण किया है, उससे देश का संघीय ढांचा कमजोर हुआ है। लोकतंत्र में जनादेश सर्वोपरि होता है और इसका हर हाल में सम्मान किया जाना चाहिए। कश्मीर और पूर्वोतर भारत के हालात क्या केन्द्र को इस बात का अहसास दिलाने के लिए काफी नहीं है कि अवाम की आवाज को दबाना भारत की एकता और अखंडता पर प्रहार करने जैसा है। इस तरह की कवायद से ही अवाम मुख्यधारा से छिटक जाता है। बहरहाल, बिहार में महागठबंधन से बाहर आकर भाजपा से गलबाहियां करने के लिए नीतिश कुमार काफी पहले से जमीन तैयार कर रहे थे। विधानसभा चुनाव जीतने के लिए उन्होंने राजद और कांग्रेस के साथ विवशता में महागठबंधन बना तो लिया मगर लालू प्रसाद द्वारा जब-तब बाहें मरोडना उन्हें रास नहीं आ रहा था। लालू बार-बार सार्वजनिक तौर पर सबसे बडी पार्टी होने का रौब झाडते। लालू से छुटकारा पाने के लिए नीतिश उचित अवसर की तलाश में थे। और मोदी सरकार ने लालू प्रसाद के खिलाफ बेनामी संपत्ति का मामला बनाकर नीतिश को यह मौका भी दे दिया। कहते हैं “राजनीति में न कोई स्थायी मित्र होता है और न कोई परमानेंट दुश्मन' । सत्ता के लिए नीतिश ने अपने सबसे बडे प्रतिद्धदी लालू से हाथ मिलाया और अब उसी भगवा पार्टी से मिल गए जिसे जद(यू) नेता चुनाव में सांप्रदायिक बता रहे थे। इस सारे खेल में न तो नीतिश जीते हैं और न ही लालू हारे हैं। अगर कोई हारा है तो वह है लोकतंत्र। मोदी जी बधाई हो, बिहार भी कांग्रेस मुक्त हो गया है।






