कानून की काट कैसे की जाए, देश के सियासी नेताओं को इसमें खासी निपुणता हासिल है। देश की संसद ने 2003 में कानून बनाया था कि मंत्रिमंडल का आकार कुल सांसदों अथवा विधायकों की संख्या का 15 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकता है। इसके लिए संविधान में बाकायदा संशोधन (91वां) भी किया गया। संविधान के अनुच्छेद 164(1ए) के तहत यह संवैधानिक व्यवस्था जनवरी 2004 से लागू है। इसके बावजूद यह जानते ही भी कि मुख्य संसदीय सचिव और संसदीय सचिव के पद असंवेधानिक हैं, विभिन्न राज्यों में सत्तारूढ दल अक्सर ऐसी नियुक्तियां करते हैं। और सबसे अधिक आश्चर्यजनक काम देश में “साफ -सुथरी और समकालीन सियासत में क्रांतिकारी बदलाव“ का दम भरने वाले अरविंद केजरीवाल ने भी वही संवैधानिक गुनाह किया जो अन्य राजनीतिक दल करते रहे हैं। बुधवार को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने हरियाणा में चार मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्तियां निरस्त कर दीं। इसमें किसी को कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इससे पहले सितंबर, 2016 में दिल्ली उच्च न्यायालय आम आदमी पार्टी सरकार के 21 संसदीय सचिव की नियुक्तियां निरस्त कर चुका है और अब इन विधायकों पर उनकी सदस्यता तक निरस्त होने का खतरा मंडरा रहा है। केजरीवाल ने अपने प्रचंड बहुमत का बेजा इस्तेमाल भी किया। मार्च 2015 में 21 संसदीय सचिव नियुक्त किए और फिर इन असंवैधानिक पदों को वैध बनाने के लिए जून में दिल्ली विधानसभा में संशोधित बिल पारित करवाया। मगर हाई कोर्ट ने यह सब नहीं माना। पंजाब में तत्कालीन अकाली-भाजपा सरकार ने भी कानून को बखूबी ठेंगा दिखाया और दो दर्जन मुख्य संसदीय सचिव नियुक्त करके संविधान का खूब मखौल उडाया। अगस्त, 2016 में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट इन मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्तियों को असंवैधानिक बता चुका है। 2005 में हिमाचल हाई कोर्ट ने अपनी व्यवस्था में साफ-साफ कहा था कि संसदीय सचिवों की नियुक्तियां मंत्रिमंडल के आकार संबंधी कानून की खुला उल्लंघन है और उनकी नियुक्तियां करके सरकार का मुखिया संविधान के अनुच्छेद 164(1ए) का भी अपमान कर रहा है। 2009 में बांबे हाई कोर्ट भी ऐसी ही व्यवस्था दे चुका है। अब हरियाणा में भाजपा सरकार ने वही काम किया है, जिसकी वह स्वंय मुखर आलोचक रही है। देश के लॉमेकर्स ने 2003 मे गहन विचार-विमर्श के बाद भारी-भरकम मंत्रिमंडल आकार को सीमित करने के लिए 91वां संशोधन किया था। तब केन्द्र में भाजपा नीत राजग की सरकार पदस्थ थी। यह बात वास्तव में दुखद है कि भाजपा सरकार भी असंवैधानिक काम कर रही है जबकि पार्टी खुद को औरों से कुछ अलग कर दिखाने का दम भरती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लोकसभा चुनाव के दौरान लोगों से “ न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन (मिनिमम गवर्नमेंट, मेक्सिमम गवर्नेंस) का सुचिता वायदा किया था। तो क्या मोदी के सिपल सलाहकार प्रधानमंत्री के इस वायदे को भूल चुके हैं। दिल्ली में भाजपा आप सरकार के 21 संसदीय सचिव की फौज की मुखर आलोचक रही है। भारत में अक्सर विदेशों में नियुक्त संसदीय सचिवों की नियुक्तियों का हवाला दिया जाता है। कनाडा, इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया, आयरलैंड और मलेशिया में मंत्रियों की सहायता के लिए संसदीय सचिवों को नियुक्त करने की परंपरा है मगर इन मुल्कों में प्रधानमंत्री इनकी नियुक्ति करता है। ईसके लिए बाकायदा कानून भी बनाया गया है। भारत में 91वां संशोधन पारित होने से पहले राज्यों में राज्य मंत्री और उप मंत्री नियुक्त करने की परंपरा थी। मगर मंत्रिमंडल का आकार तय होने के बाद इन पदों की कोई अहमियत नही रह गई। इनकी जगह असंवैधानिक मुख्य संसदीय सचिव और संसदीय सचिव पदों ने ले ली है। अब समय आ गया है कि इस मामले में स्पष्ट संवैधानिक व्यवस्था की जानी चाहिए।
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