चौतरफा मुस्लिम देशों से घिरा इसराइल अरब में अकेले अपने दमखम पर दुश्मनों के नाको चने चबाए हुए है। दुश्मनों से अपने अस्तित्व को बचाए रखना उसकी विवशता भी है और ताकत भी। इसराइल दुनिया का एकमात्र ऐसा देश हैं, जहां यहूदी बहुसंख्यक हैं। 20,770 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में बसा इसराइल हिमाचल प्रदेश से आधा भी नहीं है। इसकी आबादी 84 लाख की आबादी (2015 की जनगणना के अनुसार) हिमाचल प्रदेश से थोडी सी ही ज्यादा है। हिमाचल प्रदेश बनने के ठीक एक माह बाद 14 मई, 1948 को दुनिया का पहला यहूदी देश अस्तित्व में आया था। हिमाचल प्रदेश 15 अप्रैल, 1948 को अस्तित्व में आया था। तथापि, पूरी दुनिया इस छोटे से देश की सैन्य ताकत का लोहा मानती है। इसके पास अत्याधुनिक न्यूक्लियर हथियार हैं। दुनिया की चौथी बड़ी वायु सेना है। इतने उम्दा हथियार कि दुश्मनों की न्यूक्लियर मिसाइलें भी इसराइल के आसमानी सुरक्षा कवच को भेद नहीं सकती। 1972 के म्युनिक ओलिंपिक मेँ अपने खिलाड़यों के नर संहार से क्रोधित इसराइल की मोसाद एजेन्सी ने कातिलों को दुनिया के अलग -अलग कोने ढूंढ कर मारा डाला था। अपनी सैन्य ताकत के दम पर ही इसराइल का अस्तित्व बरकरार है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी इसराइली सेना के मुरीद हैं। 18 अक्टूबर, 2016 को हिमाचल प्रदेश में मंडी की जनसभा में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था, “ आजकल पूरे देश में हमारे सैनिकों के पराक्रम की चर्चा हो रही है। पहले कभी इसरायली सेना ने ऐसा किया, सुनते थे“। मंगलवार को राजधानी तेल अविव के एयरपोर्ट पर प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में भी इसराइल की अनुकरणीय तरक्की और कडे परिश्रम की तारीफ करते हुए कहा कि यहां के लोगों से काफी कुछ सीखा जा सकता है। मगर दुनिया भर के मुसलमान आज भी इसराइल को “ अरब की जमीन का अवैध कब्जाधारी“ मानते हैं। 1948 में ही पडोसी देशों ने इसराइल पर हमला बोल दिया था। उनकी कोशिश इसराइल को नष्ट करने की थी मगर वे इसमें सफल नहीं हो पाए। 50 साल पहले 1967 में इसराइल देशों के बीच भीषण युद्ध छिडा था पर यह छह दिन चला मगर इस युद्ध का असर आज भी समूचे अरब पर साफ दिखाई देता है। विज्ञान और उन्नत प्रोद्योगिकी के बलबूते इसराइल ने रेतीले भूभाग को भी अत्याधिक उपजाऊ बनाया है। प्रतिकूल परिस्थितियों में ड्रिप सिंचाई से लेकर नेचुरल पेस्टीसाइटस के बलबूते खारी और शुष्क मिट्टी से इसराइली किसान देश की 95 फीसदी खाधान्न की जरुरतें पूरी कर रहे हैं। बहरहाल, भारत और इसराइल में भोगोलिक और सांस्कृतिक समानता न होते हुए भी दोनों की सामरिक जरुरतें एक जैसी है। भारत की तरह इसराइल भी आतंक से बुरी तरह पीडित है। जिस तरह पडोसियों को इसराइल का अस्तित्व स्वीकार्य नहीं है, उसी तरह पडोसी पाकिस्तान को भी भारत का अस्तित्व फूटी आंख भी नहीं सुहाता है। नरेन्द्र मोदी इसराइल की यात्रा करने वाले देश के पहले प्रधानमंत्री हैं। भारत और इसराइल की बीच गत 25 सालों से डिप्लोमैटिक संबंध तो हैं मगर इससे ज्यादा अब तक कोई बडी कूटनीतिक पहल नही हो पाई है। हां, पिछले कुछ सालों से हिन्दुवाद और यहूदीवाद के बीच सकारात्मक समानताएं खोजने की कोशिशे जरुर हुईं है। भारतीय प्रधानमंत्री की पहली यात्रा से उत्साहित इसराइल उनके लिए पलक-पावडे बिछाए हुए हैं। इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने खुद एयरपोर्ट पर भारतीय प्रधानमंत्री की अगवानी की । इससे पहले इसराइल ने अब तक अमेरिकी राश्ट्रपति और पोप को ही ऐसा राजकीय सम्मान दिया है। प्रधानमंत्री की इसराइली यात्रा को दोनों देशों के बीच द्धिपक्षीय संबंधों के लिए चरमोत्कर्ष माना जा रहा है। भारत और इसराइल मिलकर आतंक के खिलाफ साझा लडाई लड सकते हैं। मगर प्रधानमंत्री की इसराइल यात्रा से अरब देशों के प्रति भारत की नीति में किसी बदलाव की कोई गुजाइंश नहीं है। अरब के मुस्लिम देशोँ की जरा भी उपेक्षा नहीं की जा सकती। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद भी इसराइल के प्रति हमारी नीति में कोई बदलाव नहीं आया है। इतना जरुर है कि प्रधानमंत्री की इसराइल यात्रा से कुछ देशों की भौंहें तन सकती हैं।
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