जर्मनी के हैमबर्ग में भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और चीनी राश्ट्रपति षी जिनपिंग के बीच “ग्रेट हैंडशेक“ से मौजूदा तनावपूर्ण संबंधों में “हिंदी-चीनी“ भाई-भाई जैसी गर्मजोशी दिख रही है। चीन का हाथ मिलाना भी उतना ही भ्रामक है जितना साठ के दशक में “हिंदी-चीनी, भाई-भाई का नारा”। पिछली बार दोनों नेताओं के बीच कजाखस्तान की राजधानी अस्ताना में मुलाकात हुई थी। तब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को इस बात का जरा भी इल्म नहीं था कि जिस समय दोनों नेता हाथ मिला रहे थे, उधर चीनी सैना भूटान की संप्रभुता का हनन कर रही थी। चीन डोकलाम से भूटान के सैन्य कैंप जोंमेली तक चौडी सडक का निर्माण करने पर आमादा है। इस सडक के बनने से भारत-भूटान-चीन के कूटनीतिज्ञ त्रिकोण की परिभाषा ही बदल सकती है। इसी लक्ष्य को सामने रखकर चीन ने पठारी क्षेत्र डोकलाम में अपनी सेना तैनात कर रखी है। और भारत ने जब भूटान की मदद के लिए वहां अपनी सेना भेजी है, चीन धमकी-दर-धमकी पर उतर आया है। पिछले एक माह से भी ज्यादा समय से चीन और भारत के बीच इन सीमा विवाद को लेकर जबरदस्त तनाव चल रहा है। सच यह है कि एशिया की दो बडी ताकतें -चीन और भारत- इस मामले में घरेलू विवशताओं से बंधे हुई हैं, इसलिए तनाव को कम करने के लिए मोदी और जिनपिंग का गर्मजोशी से हाथ मिलाना भी उम्मीद की किरण नजर आ रही है। बहरहाल, दसों दिशाओं से घिरा चीन इस समय भारत से पंगा (युद्ध करने) लेने की स्थिति में नहीं है। उत्तर कोरिया के मामले में चीन की खासी फजीहत हुई है। अब तक यह माना जा रहा था कि “बेलगाम“ उत्तर कोरिया को केवल चीन ही नियंत्रण कर सकता है। इसी स्थिति के मद्देनजर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बार-बार चीन से उत्तर कोरिया को समझाने के लिए कहते रहे हैं। उत्तर कोरिया के ताजा रुख से साफ है कि उस पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं है। एक जमाने में म्यांमार भी चीन के नियंत्रण में हुआ करता था मगर अब वह भी चीन की नही मानता है। भारत की ताकत से भयभीत पाकिस्तान एकमात्र ऐसा देश है जो चीन की शरण में है मगर उसके घरेलू हालात इतने खराब हैं कि पाकिस्तान नेताओं की अपने ही देश में कोई नहीं सुनता है। चीन की इस समय सबसे बडी दुविधा उत्तर कोरिया को लेकर है। बार-बार चेतावनी के बावजूद प्योंगयांग (उतर कोरिया) अमेरिका को चुनौती देने के लिए मिसाइल-दर-मिसाइल का टेस्ट कर रहा है। चीन भी उसे रोक नहीं पा रहा है। उत्तर कोरिया ने दो दिन पहले मिसाइल को जापानी क्षेत्र में गिराया था। अमेरिका और जापान कभी भी उत्तर कोरिया पर हमला कर सकते हैं। चीन की दुविधा है कि जिगरी दोस्त होते हुए भी चीन हमले की स्थिति में उत्तर कोरिया की खुली मदद नहीं कर सकता और न ही उसे अकेला छोड सकता है। उत्तर कोरिया को अब तक चीन से ही सैन्य और सामरिक मदद मिलती रही है। चीन अगर उत्तर कोरिया का साथ छोडता है तो दुनिया उस पर दोस्त को संकट के समय मंझधार में छोडने का तोहमद लगाएगी। दुनिया का कोई भी मुल्क चीन की दोस्ती पर भरोसा नहीं करेगा। अगर मदद करता है तो दुनिया कहेगी चीन ने तानाशा ह की मदद की है। इतना ही नहीं दक्षिण चीन सागर में चीन, अमेरिका और उसके मित्र देशों से भी युद्ध के मुजाने पर है। शुक्रवार को अमेरिका के दो बमर हवाई जहाजों ने दक्षिण चीन सागर का मुआयना करके चीन को सीधी चुनौती दी है। उत्तर कोरिया और दक्षिण चीन में पहले से चौतरफा घिरा चीन ताजा हालात में भारत से पंगा लेने की स्थिति में नहीं है। इसी वजह चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग ने मोदी से मुलाकात की जबकि पहले चीन जोर-शोर से इस बात का ढिंढोरा पीट चुका था कि मौजूदा तनावपूर्ण हालात में बातचीत नहीं हो सकती। तथापि, काइंया चीन पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
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