भाजपा ने अपने दक्षिण भारतीय “फेस“ एवं वरिष्ठ नेता वैंकेया नायडू को उप-राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाकर एक तीर से कई निशान साधे है। पार्टी का यह फैसला उतना हैरतअंगेज भी नहीं है जितना राष्ट्रपति पद के लिए रामनाथ कोविंद का चयन। लाल कृष्ण आडवानी, मुरली मनोहर जोशी , शांता कुमार जैसे दिग्गज और अनुभवी नेताओं के रहते अपेक्षाकृत कनिष्ट राम नाथ कोविंद का राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनाए जाने से राजनीतिक गलियारों में सुगबुगाहट स्वभाविक है। वरिष्ठता और अनुभव में वैंकेया नायडू भी राम नाथ कोविंद पर भारी पडते हैं। नायडू जुलाई 2002 से अक्टूबर 2004 तक भाजपा के राष्ट्री अध्यक्ष भी रह चुके हैं। कोविंद दलित हैं और देश के सबसे बडे राज्य उत्तर प्रदेश से हैं, देश के प्रथम नागरिक राष्ट्रपति पद उम्मीदवार चयन के लिए इस तरह के मानदंड क्या वाकई तार्किक और प्रासंगिक हैं? और यह भी जरुरी नहीं है कि अगर राष्ट्रपति उत्तर भारत से हो तो उप-राष्ट्रपति दक्षिण भारत से ही हो। कम-से-कम राष्ट्रपति , उप-राष्ट्रपति पदों के चयन में तो जात-पात, क्षेत्रवाद और राजनीतिक नफे-नुकसान की जगह योग्यता को तरजीह नहीं दी जानी चाहिए। वैंकेया नायडू का उप-राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बनाया जाना भाजपा की सामरिक विवशता भी है। उप-राष्ट्रपति राज्यसभा का सभापति भी होता है और यही इस पद की प्रमुख संवैधानिक जिम्मेदारी भी है। भाजपा नीत सतारूढ राजग गठबंधन के पास फिलहाल राज्यसभा में बहुमत नही है। संसदीय कार्यों को लेकर सबसे ज्यादा समस्या भी राज्यसभा में हो रही है। सतारूढ गठबंधन को राज्यसभा से सरकारी कामकाज निपटाने में खासी दिक्कत आ रही है। अब तक मोदी सरकार के कई अहम बिल राज्यसभा की वजह से लटकते रहे हैं। यहां तक कि जीएसटी जैसा मह्त्वपूर्ण बिल भी लंबे समय तक राज्यसभा में लटका रहा। इस स्थिति में भाजपा को ऐसे नेता की तलाश थी जो राज्यसभा का संचालन बखूबी कर सके और सरकार को “एल्डर हाउस“ को लेकर ज्यादा परेशानी न उठानी पडे। वैंकेया नायडू मूल रुप से आंध्र प्रदेश से हैं मगर अब उनका परिवार चैन्नई में बस गया है। इस लिहाज से देखा जाए तो भाजपा ने एक तीर से कई निषान किए हैं। उत्तर-दक्षिण का संतुलन भी स्थापित कर लिया गया और राज्यसभा के लिए काबिल सभापति भी मिल गया। सत्तारूढ गठबंधन के पास उप-राष्ट्रपति प्रत्याशी की जीत सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त बहुमत है। बतौर संसदीय कार्य मंत्री वैंकेया नायडू का कामकाज बेहतर रहा है। उनके राजग के अलावा कांग्रेस, जनता दल (यू), राकांपा और समाजवादी पार्टी में भी अंतरंग मित्र हैं। उन्होंने विपक्ष से जो संबंध बना रखे हैं, वह सब उनके काम आ सकते हैं। इससे पहले 2002 में भाजपा के राजस्थानी दिग्गज नेता भैरो सिंह शेखावत और 2007 में नजमा हेपतुल्ला बतौर उप-राष्ट्रपति और राज्यसभा सभापति अपना दायित्व बखूबी निभा चुकी हैं। तब भी भाजपा नीत राजग के पास राज्यसभा में बहुमत नहीं था। भाजपा के वरिष्ठ नेता भैरो सिंह शेखावत के भी पार्टी के बाहर विभिन्न राजनीतिक दलों में अंतरंग मित्र हुआ करते थेे। शेखावत के राजनीति कौशल और दूरदर्शिता का लोहा विरोधी भी मानते थे। वैंकेया नायडू का कद भले ही शेखावत बराबर न हो मगर दोनों में काफी समानता है। राजनीतिक कौशल और सियासी अनुभव में नायडू अपने प्रतिद्धंदी गोपाल गांधी पर भारी पडते है़ं। गांधी, निसंदेह, विद्धान और कुशल प्रशासक है मगर उनके पास नायडू जैसा राजनीतिक अनुभव नहीं है। राज्यसभा के कुशल संचालन के लिए राजनीतिक अनुभव हो तो इसे अतिरिक्त योग्यता मानी जाती है। बहरहाल, वैंकेया नायडू के केन्द्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने पर अब मोदी मंत्रिमंडल का विस्तार अनिवार्य लग रहा है। मनोहर पर्रिकर के गोवा के मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद अब रक्षा ंमंत्रालय के अलावा सूचना और प्रसारण एव शहरी विकास मंत्रालय भी खाली हो गया है। संसद के मौजूदा मॉनसून सत्र के दौरान भी मंत्रिमंडल का विस्तार हो सकता है।
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