समकालीन भारत में सियासी गठबंधन ज्यादा समय तक चल ही नहीं सकता। पिछली सदी में साठ के दशक में क्षत्रपों के सियासी गठबंधन का प्रयोग हालांकि बढते-बढते सदी के अंत तक केन्द्र में भी आजमाया गया मगर सियास दलों की अंतर्कलह ने किसी भी गठबंधन को ज्यादा समय तक नहीं चले दिया। गठबंधनों का टूटना-बिखरना बद्स्तूर जारी रहा। फिर चाहे भाजपा नीत राजग हो या कांग्रेस नीत संप्रग। सियासी गठबंधन अपनी अंतर्कलह से किस तरह बैमोत मरता है, बिहार में लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल (राजद्), नीतिश कुमार के जनता दल (यू) और कांग्रेस के बीच महागठबंधन इसकी ताजा मिसाल है। लालू प्रसाद यादव, जद(यू) और कांग्रेस नेताओं के “अटूट गठबंधन“ के तमाम दावों के बावजूद बिहार का महागठबंधन लगभग टूट की कगार पर है। इस बार लालू प्रसाद यादव परिवार का कथित बेनामी संपत्ति घोटाला महागठबंधन की टूट का कारण बन रहा है। भ्रष्टाचार पर “जीरो टॉलरेस“ का दावे करने वाले मुख्यमंत्री नीतिश कुमार चाहते हैं कि “लालू पुत्र“ उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव बेनामी संपत्ति मामले में नाम आने के बाद स्वेच्छा से पद छोड दंे। तेजस्वी से त्यागपत्र मांगने अथवा उन्हें बर्खास्त करने का साहस वे जुटा नहीं पा रहे हैं। मुमकिन है तेजस्वी को हटाने की बजाए वे खुद ही हटने का नाटक मंचित करें। वे पहले भी ऐसा कर चुके हैं। लालू तेजस्वी यादव के इस्तीफे नही देने पर अडे हुए हैं। लालू की पार्टी दहाड रही है“ हमारे पास 80 विधायक हैं और तेजस्वी पार्टी के बूते उप-मुख्यमंत्री बने है। इसलिए तेजस्वी से उप-मुख्यमंत्री का इस्तीफा मांगने वाले बाहरी (नीतिश ) कौन होते हैं?“ राजद की इस दहाड में वजन भी है। राजद की तुलना में जनता दल (यू) के कम (71) विधायक होने के बावजूद लालू ने नीतिश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया था। सवाल किया जा रहा है कि मुख्यमंत्री बनने पर अथवा महागठबंधन बनाते समय नीतिश कुमार को “ भ्रष्टाचार पर “जीरो टॉलरेस“ पर “जीरो टॉलरेस“ क्यों याद नहीं रहा? चारा घोटाले में सजायाफ्ता होने के बावजूद नीतिश कुमार सत्ता पाने के लिए लालू प्रसाद से गठबंधन के लिए सहर्ष तैयार हो गए जबकि बिहार के दोनों दिग्गज अब तक एक-दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाते थे। तब यह समझ पाना ज्यादा मुश्किल नहीं था कि सत्तालोलुपता की गलबहियां पर “ भ्रष्टाचार पर “जीरो टॉलरेस“ “ की आंच भी बेअसर हो रही थी। जिस देश में सियासी दल चुनाव लडने के लिए झूठ-फरेब का सहारा लेते हों, अपराधियों को पार्टी का टिकट देकर उन्हें गले लगाते हों, वहां भ्रष्टाचार पर “जीरो टॉलरेस“ पर “जीरो टॉलरेस“ सबसे बडा मजाक लगता है। सच यह है कि नीतिष कुमार एंड कंपनी का भ्रष्टाचार पर “जीरो टॉलरेस“ तो बहाना मात्र है। वैसे भी मूल्य, सिद्धांत और स्वस्थ परपराएं भारतीय राजनीति में कोई मायने नहीं रखती। जनता पार्टी से जनता दल, फिर समता पार्टी और अंत में जनता दल (यू) तक नीतिश कुमार का लंबा सफर रहा है। और अब उनका फिर गैर-भाजपा दलों से मन उब चुका है। लालू प्रसाद से तो कुछ ज्यादा ही। गठबंधन के सत्ता में आने के बाद जैसे ही लालू प्रसाद ने नीतिश कुमार की बाहें मरोडनी शुरु कर दीं, कुमार बुरी तरह चिढ गए। इसीलिए उन्होंने लालू प्रसाद और गठबंधन को पहला झटका पिछले साल नवंबर में नोटबंदी पर दिया। ऐसे समय में जब समूचा विपक्ष नोटबंदी पर मोदी सरकार को हर तरफ से घेर रहा था, नीतिश ने नोटबंदी की तारीफ में कसीदे पढ कर न केवल लालू को अलबता पूरे विपक्ष को जोर का झटका दिया। इसके बाद से वे अनन्य “मोदी भक्त” हो गए । राष्ट्रपति चुनाव में पहले साझा विपक्ष के उम्मीदवार की पैरवी करते रहे , फिर अचानक कह दिया कि वे भाजपा उम्मीदवार का समर्थन करेंगे। नीतिश उगते सूरज को नमस्कार करते हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव को सामने रखकर नीतिश फिर भाजपा के संग जाने चाहते हैं। महागठबंधन को तो हर हाल में टूटना ही है।
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