शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

भारत के महामहिम राम

दलित परिवार से संबंधित रामनाथ कोविंद देश  के 14वें  राष्ट्रपति  चुने गए हैं। कोविंद की पृष्ठ्भूमि  काफी साधारण  है। उत्तर प्रदेश  के कानपुर देहात में गरीब दलित परिवार से संबंधित कोविंद का देश  के सर्वोच्च पद पर पहुंचना लोकतंत्र की महानता  दर्शाता  है। दूसरी बार  दलित देश  का राष्ट्रपति  चुना गया है। बीस साल पहले 1997 में राजनयिक के आर नारायणन देश  के पहले दलित राश्ट्रपति चुने गए थे। मिट्टी के कच्चे घर से रायसीना हिल्स के 365 कमरों के राश्ट्रपति भवन तक का रामनाथ कोविंद का सफर वास्तव में अनुकरणीय है। राश्ट्रपति चुने जाने पर कोविंद ने अपने पहले संदेष में इस बात पर जोर दिया कि अगर वे राश्ट्रपति बन सकते हैं, तो भारत का कोई भी आम आदमी देष के सर्वोच्च पद तक का सफर तय कर सकता है। महामहिम ने अपनी अति साधारण पृश्ठभूमि का उल्लेख करते हुए बरसात के उन दिनों को याद किया जब उन्हें अपने भाई-बहनों के साथ पानी बरसने पर घास-फूस से बने छप्प्पर से पानी टपकने पर दीवार से खडे रहकर रात गुजारनी पडती थी। उनकी इस बात में देष के करोडों गरीब एवं दबे-कुचलों की दुर्दषा का मर्म  झलकता है। ्केन्द्र और तेरह राज्यों में सत्तारूढ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नीत राजग के राश्ट्रपति पद के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद ने विपक्ष के साझा उम्मीदवार पूर्व  लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार को पराजित किया है। कोविंद को निर्वाचक मंडल के  65 फीसदी से कुछ ज्यादा वोट मिले हैं। मीरा कुमार को 34 फीसदी। इस राश्ट्रपति चुनाव की सबसे बडी विषेशता यह रही है कि दिल्ली समेत कई राज्यों में विपक्ष से कोविंद के पक्ष में क्रॉस वोटिंग हुई है।  कहते हैं “ इतिहास खुद को दोहराता है“। 2012 में कांग्रेस नीत संप्रग के उम्मीदवार  प्रणब मुखर्जी ने भी भाजपा समर्थित पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पीए संगमा को पराजित किया था और तब भी विपक्ष से क्रॉस वोटिंग हुई थी। क्रॉस वोटिंग पर विपक्ष की उम्मीदवार मीरा कुमार का कहना था कि राश्ट्रपति चुनाव में “अंर्त्यात्मा की आवाज“ पर मतदान होना लोकतंत्र के लिए षुभ संकेत है। 1969 में देष के चौथे राश्ट्रपति चुनाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी  “अंर्त्यात्मा की आवाज“ की पैरवी की थी।  24 जुलाई को वर्तमान राश्ट्रपति प्रणब मुखर्जी अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा कर रहे हैं। कोविंद 25 जुलाई को राश्ट्रपति की षपथ लेंगें। आजादी के सात दषक में पहली बार देष के तीन सर्वोच्च पदों- राश्ट्रपति, उप-राश्ट्रपति और प्रधानमंत्री- पर राश्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) के कार्यकर्ता पदस्थ होंगे। राश्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के लिए  यह गौरव की बात है। तथापि, इस स्थिति से कुछ लोग खासे चिंतित भी हैं। इसकी वजह है कि आरएसएस कटटर हिंदूवादी सोच वाली संस्था है और वह भारत के संवैधानिक धर्मनिरपेक्ष चरित्र की मुखर आलोचक है। चीन के साथ  सिक्किम को लेकर ताजा सीमा विवाद में बीजिंग ने चेताया भी है कि भारत में बढता हिंदू राट्रवाद दोनों देष के बीच युद्ध का कारण बन सकता है। भाजपाइयों की असहिश्णुता और गो-रक्षा जैसे संवेदनषील मुद्दे को  उछालने से अल्पसंख्यकों में पहले से असुरक्षा भावना घर चुकी है। प्रधानमंत्री की चेतावनी के बावजूद  भगवा संगठनों के कार्यकर्ता  देष के धर्म  निरपेक्ष चरित्र को तार-तार करने में कोई कसर नहीं छोड रहे हैं। इससे पता चलता है कि देष किन हालात से गुजर रहा है। हाल ही की कुछ घटनाएं देष की अखंडता के लिए लिए षुभ नहीं है। देष  में समान नागरिक संहिता लागू करना और अनुच्छेद 370 को निरस्त करना भाजपा के प्रमुख मुद्दे रहे हैं। रायसीन हिल्स और राज्यसभा (उप-राश्ट्रपति)  जैसे  सर्वोच्च पदों पर आरएसएस विचारकों का पदस्थ होना भाजपा को इन मुद्दों को लागू करने में मददगार हो सकता है। देष में धर्म निरपेक्ष लोगों के लिए यही चिंता का सबब है।