आम आदमी के लिए यह जानकारी काफी सुकून भरी है कि देश में मंहगाई (खुदरा मुद्रा स्फीति) अठारह साल के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई है। खाने-पीने की चीजें सस्ती होने के कारण जून माह में खुदरा मुद्रा स्फीति गिरकर 1.54 फीसदी पर आ गई है। महंगाई में आशातीत गिरावट के लिए देश को 18 साल तक इंतजार करना पडा। इससे पहले 1999 में रिटेल मुद्रा स्फीति 1.54 फीसदी के स्तर पर थी। अगर और पीछे जाएं तो अगस्त 1978 में खुदरा मुद्रा स्फीति इसी स्तर पर थी। खुदरा मुद्रा स्फीति में उपभोक्ता द्वारा रिटेल दुकान पर विभिन्न वस्तुओं के लिए चुकाई जाने वाली कीमतों को शामिल किया जाता है। ठीक एक साल पहले खुदरा मुद्रा स्फीति 5.77 फीसदी के स्तर पर थी। यानी एक साल के दौरान भारत में महंगाई में चार फीसदी से भी ज्यादा की गिरावट आई है। यह वाकई बहुत बडी गिरावट है। बुधवार को जारी रिपोर्ट में बताया गया है कि जून में खुदरा महंगाई में 2.12 फीसदी की गिरावट आई है। साग-सब्जियों की कीमतों में 16 फीसदी और दाल-दहलनों की कीमतों में 21 फीसदी की गिरावट आई है। मगर दूध 4.15 फीसदी और फल 2 फीसदी महंगे हो गए। अगर ऐसा नहीं होता तो महंगाई और कम हो जाती। बहरहाल, मई में चूंकि औधोगिक उत्पादन में 1.7 फीसदी की गिरावट आई थी, इसके स्पष्ट संकेत हैं कि अर्थव्यवस्था में सुस्ती व्याप्त है और इसे मंदी से उबारने के लिए मांग को उठाकर ग्रोथ को रफ्तार देने की आवश्यकता है। मगर देश का सैंट्रल बैंक आरबीआई अभी भी प्रतिबंधित नोटों को गिनने में व्यस्त है। नोटबंदी के बाद से कर्ज को सस्ता करने की मांग की जा रही थी। नोटबंदी ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था की ग्रोथ रोक दी थी। मगर शुक्र है इस बार जमकर पानी बरस रहा है जिससे रिकार्डतोड फसल की उम्मीद की जा रही है। नोटबंदी के बावजूद रबी की बंपर फसल हुई और अब दूसरे साल अच्छी बरसात के कारण खरीफ की बंपर फसल की उम्मीद की जा रही है। इससे जुलाई के बाद की तिमाही में भी महंगाई दो फीसदी से नीचे रहने की उम्मीद है। यही आरबीआई का खुदरा महगाई को लेकर लक्ष्य है। इस स्थिति में उम्मीद की जा रही है कि आरबीआई अगस्त में जारी होने वाली अपनी मौद्रिक नीति में ब्याज दरों में अगर ज्यादा नहीं तो 0.25 फीसदी की रियायत दे सकता है। महगांई के कम होने से सबसे ज्यादा राहत आम आदमी को मिली है। इस स्थिति में साफ है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का “अच्छे दिन“ लाने का वायदा वास्तव में साकार हो रहा है। आम आदमी को दो वक्त का पेट भर भोजन मिल जाए, यही पर्याप्त है। किसान को उसकी फसल के वाजिब दाम मिल जाए, उसके लिए इतना ही काफी है। मेहनतकश श्रमिकों को रोजगार मिल जाए, उसके लिए इससे ज्यादा अच्छी बात हो ही नहीं सकती। किसानों के लिए केन्द्र समेत राज्यों की सरकारें काफी कुछ कर रही है। कृषि उत्पादों के माकूल दाम सुनिश्चित करने के लिए देश में मजबूत बुनियादी ढांचा खडा किया गया है। सरकार फसलों के न्यूनतम खरीद दाम भी तय करती है। मंडियों में सरकारी खरीद तक की जाती हैं। इतना सब किए जाने के बावजूद भी देश का 90 फीसदी किसाान आजादी के सात दशक बाद भी बदहाल है। यही हाल मेहनतकश श्रमिकों का है। इसके लिए देश की भ्रष्ट और लचर व्यवस्था को जिम्मेदार माना जा रहा है। सूदखोर और साहूकार अभी भी किसानों और श्रमिकों का खुलक शोषण कर रहें हैं। कानून का धडल्ले से उल्लघंन किया जाता है। और देश के सियासी नेता इसमें सबसे आगे है। निजीकरण के बाद बैंक सबसे बडे साहूकार बन गए है। सूदखोर बैंकों की मनमानी पर कोई अंकुश नहीं हे। महंगे कर्ज से व्यवस्था बद से बदतर होती जा रही है। आरबीआई को इन सब खामियों को दूर करना चाहिए।
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