“जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि“, इस जुमले को आधुनिक परिवेश में यूं कहा जा सकता है,“ जहां न पहुंचे सरकार, वहां पहुंचे पत्रकार। इंटरनेट के जमाने में मीडिया सरकार से भी कहीं ज्यादा सामाजिक सरोकारी हो गया है। इराक में लापता 39 भारतीयों के बारे मोसुल से ताजा अपडेट लाकर मीडिया ने मोदी सरकार को ही कटघरे में खडा कर दिया है। दुनिया के खूंखारतम आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया (आईएसआईएस) को मोसुल से खदेडे जाने के बाद भी 39 लापता भारतीयों के बारे कोई पुख्ता सूचना नहीं मिल रही है। लापता भारतीयों के परिजन अभी भी यह उम्मीद लगाए बैठे हैं कि सभी 39 भारतीय इराक की किसी जेल में बंद हैं। इन लापता भारतीयों के बारे न तो भारत सरकार को कोई पुख्ता जानकारी है और न ही इराकी सरकार को। भारत की यात्रा पर नई दिल्ली पहुंचे इराक के विदेश मंत्री इब्राहिम अली जाफरी ने तो साफ-साफ कह दिया है कि उनकी सरकार को लापता भारतीयों के बारे कोई जानकारी नही हैं। इस बयान से लापता के परिजनों की चिंता बढना स्वभाविक है। केन्द्र सरकार भी 39 लापता भारतीयों के बारे ठोस जानकारी नहीं दे पा रही है। पिछले सप्ताह विदेश मंत्री सुश्री सुषमा स्वराज ने कहा था कि लापता भारतीय मासूल की बंदूश जेल में बंद हैं। मगर मीडिया ने बंदूश जाकर सरकार के इन दावों की कलई खोल दी। मीडिया ने साबित कर दिया कि बंदूश में जेल कई माह से अस्तित्व में है ही नहीं। आईएसआईएस के आतंकीं इस जेल को बहुत पहले नष्ट कर चुके हैं। जाहिर है विदेश मंत्री ने यह बयान विदेश राज्य मंत्री जनरल (सेवा निवृत) वीके सिंह और इराक में भारतीय दूतावास की ब्रीफिंग पर दिया था। विदेश राज्य मंत्री लापता भारतीयों का पता लगाने स्वंय इराक गए थे, इसलिए उनकी जानकारी को विदेश मंत्री ने पुख्ता माना। मगर मीडिया ने बंदूश जाकर सच्चाई का पता लगा ही लिया। इस प्रकरण से साफ पता चलता है कि भारत का कोई भी अधिकारी मोसुल गया ही नहीं। अगर गया होता तो सरकार को पता चल जाता कि बंदूश जेल कबकी खंडहर में तब्दील हो चुकी है। दरअसल, नौकरशाहों को भीषण युद्ध से जूझ रहे मोसुल में जाने का मादा ही नहीं है। भला बाबुओं को अपनी जान जोखिम में डालने की क्या पडी है? जनरल वीके सिंह ने भी ताजा जानकारी को पुख्ता करने की जहमत नहीं उठाई। इराक में भारतीय दूतावास के स्टाफ ने इधर-उधर से सुन-सुनाकर जो जनकारी दी, विदेश मंत्री ने अक्षरश; संसद में पेश कर दी। कांग्रेस अब विदेश मंत्री पर सदन को गुमराह करने का आरोप लगा रही है। विदेश मंत्री बेहद सुलझी हुई राजनीतिज्ञ और प्रखर वक्ता है। बुधवार को उन्होंने कांग्रेस को यह कहकर शांत कर दिया कि बगैर पुख्ता जानकारी के किसी को मृत बताना घोर पाप है। बहरहाल, पूरा मामला खामख्वाह राजनीति में उलझता जा रहा है। तीन साल पहले 40 भारतीय इराक में लापता हो गए थे। इनमेंसे एक हरजीत मसीह जैसे-तैसे भारत लौट आया था और उसने दावा किया था कि बाकी 39 भारतीयों को आईएस आतंकियों ने मार डाला। मगर न तो भारत सरकार ने और न ही लापता के परिजनों ने तब हरजीत के इस बात पर विश्वास किया । लापता भारतीयों के परिजन इस मामले को लेकर कई बार विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से मिल चुके हैं मगर आज तक उन्हें अपने प्रियजनों को लेकर कोई ठोस जानकारी नहीं मिल पाई है। परिजन इस बात को लेकर परेशान हैं कि आखिर 39 भारतीयों को जमीन निगल खा गई या आसमान निगल गया? अधिकांश लापता भारतीय पंजाब से हैं और इन्हें इराक भेजने के लिए परिजनों ने अपनी जमीन-जायदाद तक बेच डाली थी। अब इन परिवारों के पास न तो जमीन है और न ही कमाई करने वाला परिवार का सदस्य। केन्द्र और राज्य सरकार को इनकी मदद के लिए आगे आना चाहिए।
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