नोटबंदी के कारण भारी कष्ट सहने के बावजूद देश के जनमानस को प्रधानमंत्री की बात पर पूरा भरोसा है। देशवासियों के इस धैर्य और कुर्बानी भाजपा खूब इतरा रही है। प्रधानमंत्री ने लोगों से नोटबंदी से उपजे संकट से निपटने के लिए 50 दिन का समय मांगा है और इस माह के अंत में यह अवधि खत्म होने जा रही है। नोटबंदी फैसले के एक माह बाद अभी भी देश नगदी के संकट से उभर नहीं पाया है। तथापि लोगों को पूरी उम्मीद है कि दिसंबर होते-होते नव वर्ष में लोगों को नगदी के संकट से जूझना नहीं पडेगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रविवार को उत्तर प्रदेश में जनसभा को संबोधित करते हुए फिर कहा कि नोटबंदी पर उन्हें अपना “50 दिन“ का वायदा अच्छी तरह से याद है और वे हर हाल में इसे पूरा करेंगे। प्रधानमंत्री ने विपक्ष पर आरोप लगाया कि वह संसद में उन्हें बोलने नहीं दे रहा है, इसलिए वे जनता से मुखातिब होकर नोटबंदी पर अपना पक्ष रख रहे हैं। निसंदेह, नोटबंदी के बाद नवंबर माह की अपेक्षा दिसंबर में स्थिति में मामूली सुधार आया है मगर सामान्य स्थिति लौटने में काफी समय लग सकता है। व्यवस्था में गंभीर खामियां हैं, और इसके लिए देश की भ्रष्ट “ नौकरषाही और बैकिंग व्यवस्था जिम्मेदार है। लोग-बाग ही नहीं सरकार खुद इस बात पर हैरान है कि उपलब्ध नगदी का नियंत्रित करने के लिए बैंकों और एटीएम से नगदी निकालने की सीमा तय किए जाने के बावजूद काला धन जमा करने वालों को करोडों के नए नोट कहां से मिल रहे हैं? नोटों की छपाई सेना के कडे पहरे में की जा रही है और देश के विभिन्न शहरों में नोटों की खेप कडी सुरक्षा में पहुंचाई जा रही है। जाहिर है नए नोटों को काला धन जमा करने वालों को “बेचने“ का धंधा बेंकों के माध्यम से चल रहा है। यहीं नही देश के निजी क्षेत्र के कई बैंक बुला-बुला कर पुराने नोट जमा करने का न्यौता दे रहे हैं। ताजा सूचना के अनुसार प्रधानमंत्री को बैंकों में दलाल, पुलिस और काला धंधा करने वालों के बीच जबरदस्त सांठगांठ के पुख्ता सबूत मिले हैं। बैकों की 500 शाखाओं में करवाए गए स्टिंग से सामने आया है कि किस तरह “भ्रष्ट" बैंककर्मी” पुलिस और दलाल से मिलकर प्रधानमंत्री की काला धन बाहर निकालने की मुहिम को पलीता लगा रहे हैं। देश को कुल मिलाकर 14.5 लाख करोड रु के नए नोट की जरुरत है। 8 नवंबर के बाद इतनी करंसी सिस्टम से सोखी जा चुकी है। आंकडों के अनुसार रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की नोट छापने वाले यूनिट दिन-रात काम कर रहे हैं और प्रतिदिन 15 से 20 मिलियन के नए नोट छाप रहे हैं। आरबीआई के अनुसार अब तक लगभग तीन लाख करोड के नए नोट सिस्टम में डाले जा चुके हैं। मगर इसमें 2000 और 500 रु के नोट शामिल नहीं हैं। अनुमान है कि आरबीआई ने 2000 रु के लगभग दो बिलियन के नए छापे हैं। 500 रु के नोट अभी ज्यादा संख्या में सिस्टम में आए नहीं है। कुल मिलाकर, अभी तक सिस्टम में 5 लाख करोड रु ही डाले गए हैं जबकि 14.5 लाख करोड रु (14,500 बिलियन) की जरुरत है। मोटे तौर पर, एक महीने में आरबीआई अगर पांच लाख करोड रु के नए नोट छाप पाया है, तो अगले बीस दिन में साढे नौ लाख करोड रु की छपाई कतई मुमकिन नही है। आरबीआई प्रतिदिन ज्यादा से ज्यादा 20 मिलियन नए नोट छाप सकता है। यानी एक बिलियन नए नोट छापने में ही 50 दिन लगते हैं। इस गति से आरबीआई को बकाया साढे नौ लाख करोड मूल्य के नए नोट छापने में कई महीने लग सकते हैं । प्रधानमंत्री ने फिर कहा है कि उन्होंने हिसाब लगाया है कि नोटबंदी से उत्पन्न स्थिति को सामान्य होने में 50 दिन लग सकते हैं। देश के जनमानस की दिली इच्छा है कि प्रधानमंत्री का गणित सही हो और नए साल में लोगों को अपना पैसा निकालने के लिए बैंकों के धक्के न खाने पडे। मगर जमीनी सच्चाई इस बात की पुष्टि नहीं करती है।
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