चंडीगढ नगर निगम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की शानदार जीत से नोटबंदी के आलोचकों की जुबान पर ताला लग जाना चाहिए। नोटबंदी के कारण जनमानस को हो रही असुविधा और कष्ट से चिंतित विपक्ष को जनता ने “ हमारी चिंता छोडिए, अपनी कीजिए“ सरीखा करारा जवाब दिया है। चंडीगढ नगर निगम की 26 सीटों मेंसे भाजपा ने 20 और उसके सहयोगी दल शिरोमणि अकाली दल ने 1 सीट जीती है। कांग्रेस को मात्र 4 सीटें मिली है। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का सुपडा साफ हो गया है। नगर निगम के पिछले हाउस में कांग्रेस के पास 11 और भाजपा के पास 10 सीटें थीं। बसपा के दो सदस्य थे। नोटबंदी के समय भाजपा को चंडीगढ नगर निगम में दो-तिहाई सीटें मिलना पार्टी की बडी उपलब्धि है। ताजा जनादेश के साफ संकेत है कि जनता नोटबंदी पर पूरी तरह से प्रधानमंत्री के साथ है। प्रधानमंत्री के जनहित फैसलों की खातिर देश का जनमानस घंटों कतार में खडे रहने, कष्ट और असुविधा झेलने के लिए भी तैयार है। यह वही जनमानस है जो मामूली सी असुविधा के लिए एकदम सडक पर उतर जाया करता था। चंडीगढ देश का सबसे ज्यादा जागरुक शहर है और इस शहर में सर्विस सेक्टर से जुडे लोगों का वर्चस्व है। 90 फीसदी से ज्यादा पुरुष और 81 फीसदी महिलाएं साक्षर है। स्मार्ट सिटी बनने की कगार पर है। पंजाब और हरियाणा के साथ-साथ चंडीगढ हिमाचल प्रदेश की राजनीतिक नब्ज भी है। पंजाब में जल्द ही विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं और मतदान की तारीख की किसी भी क्षण घोषणा की जा सकती है। हिमाचल प्रदेश में 2017 के अंत में चुनाव कराए जाएंगे। इस लिहाज से चंडीगढ के नगर निगम चुनाव नतीजे पंजाब और हिमाचल प्रदेश के लिए अहम मायने रखते हैं। केन्द्र शासित चंडीगढ में नगर निगम को ही एक तरह से विधान सभा माना जाता है। चंडीगढ की आबादी में पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के लोगों का वर्चस्व है। पंजाब में भाजपा शिरोमणि अकाली दल के साथ लगातार दस साल से सत्ता में है। चंडीगढ के नगर निगम चुनाव नतीजों से पंजाब सतारुढ गठबंधन का फूले नहीं समाना स्वभाविक है। कांग्रेस के लिए नगर निगम के चुनाव निराशाजनक रहे हैं। लोकसभा चुनाव के बाद से कांग्रेस को हर चुनाव में झटके पर झटका लगता रहा है। दिल्ली, राजस्थान, महाराष्ट्र और हरियाणा कांग्रेस के हाथ से जाता रहा है। नोटबंदी के बाद कांग्रेस को महाराष्ट्र के निकाय चुनावों के परिणामों से जो थोडी-बहुत राहत मिली थी, चंडीगढ नगर निगम चुनाव नतीजों से वह काफूर हो गई है। कांग्रेस नेता बेशक यह कर अपने दिल को तसल्ली दें कि चंडीगढ के लोकल चुनाव पंजाब पर कोई असर नहीं डालेंगे, पर सच्चाई यही है कि आने वाले तूफान का बहती बयार से पता चल जाता है। भाजपा पंजाब में शहरों और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में ठोस जनाधार है और अकाली दल का देहाती क्षेत्रों में। चंडीगढ नगर निगम चुनाव नतीजे शहरी मतदाताओं के रुझान की झलक है। भाजपा के लिए यह राहत की बात है कि नोटबंदी से शहरी मतदाता मोदी के साथ है और अगर यही रुझान पंजाब विधानसभा चुनाव में सक्रिय हुआ, तो कांग्रेस को लेने के देने पड सकते हैं। कांग्रेस के लिए पंजाब के विधानसभा चुनाव “ डू एंड डाई“ जैसे हैं। अब यही एकमात्र ऐसा राज्य है जो कांग्रेस की लाज रख सकता है। पंजाब के साथ उतराखंड के भी चुनाव होने हैं और फिर वर्षान्त तक हिमाचल प्रदेश में। इन दोनों राज्यों में अभी कांग्रेस की सरकार है। दोनों राज्यों के विधानसभा चुनाव में हर बार सतारुढ दल के खिलाफ “एंटी इंकूबेंसी“ सक्रिय रहा है। कांग्रेस के लिए बस यही सकून की बात है कि पंजाब में लोकसभा चुनाव के दौरन मोदी लहर इतनी प्रचंड नहीं थी, जितनी अन्य राज्यों में थी।
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