शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

बढते रेल हादसे

बुधवार को कानपुर के निकट सियालदह-अजमेर एक्सप्रेस हादसे ने भारत में सुरक्षित रेल यात्रा पर फिर सवालिया निशान खडा कर दिया है। दो माह में कानपुर के निकट यह दूसरा रेल हादसा है। इस बार भी  सियालदह-अजमेर एक्सप्रेस के 15 डिब्बे पटरी से उतर गए और इस हादसे में 65 यात्री घायल हो गए। कहा जा रहा है कि ट्रैक खराब था, इसलिए यह हादसा हुआ। पिछले माह 20 नवंबर को कानपुर के निकट इंदौर-पटना एक्सप्रेस पटरी कानपुर के निकट पटरी से उतर गई थी और इस हादसे में 150 से ज्यादा यात्री मारे गए थे। तब भी ट्रैक खराब होने के कारण हादसा हुआ था। अब सवाल यह है कि कानपुर के निकट ही बार-बार रेल ट्रैक क्यों खराब हो रहा है जबकि 38 दिन  पहले ही कानपुर के निकट पटरी टूट जाने से बडा हादसा हुआ था। इस माह यह दूसरा रेल हादसा है। 6 दिसंबर को बिहार के राजेन्द्रनगर से गुवाहटी जा रही केपिटल एक्सप्रेस के पटरी से उतर जाने के कारण 2 यात्री मारे गए थे और 10 घायल हो गए थे। 5 अक्टूबर को जम्मू तवी-पुणे झेलम एक्सप्रेस के 9 डिब्बे पटरी से उतर गए थे मगर  शुक्र है इस हादसे में कोई हताहत नहीं हुआ। 28 अगस्त को तिरुवनन्तपुरम-मंगलौर एक्सप्रैस के 2 डिब्बे पटरी से उतर गए थे। एक मई को उत्तर प्रदेश  में हापुर के निकट पुरानी दिल्ली-फैजाबाद एक्स्प्रैस के 8 डिब्बे पटरी से उतर गए और इसमें 12 यात्री घायल हो गए थे। 5 फरवरी को क्न्याकुमारी-बंगलौर एक्सप्रैस के कुछ डिब्बे तमिल नाडु में पटरी से उतर गए थे और इस हादसे में 10 लोग घायल हो गए थे। कुल मिलाकर, इस साल अब तक सात से अधिक हादसे रेल डिब्बों के पटरी से उतरने के कारण हो चुके हैं।  हैरानी इस बात पर है कि टूटी पटरी  (फैक्चरड टैªक) का पता लगाने के लिए रेलवे के पास पुख्ता व्यवस्था होने के बावजूद   डिब्बों  के  पटरियों  से उतरने के हादसे हो रहें हैं । रेलवे ट्रैक की नियमित जांच होती है और नवंबर में कानपुर के निकट हादसे के बाद आसपास के ट्रैक्स की नियमित जांच हुई थी। ट्रंक रुट की हर मेन लाइन पर अल्ट्रासोनिक वॉल  डिटेक्शन  लगाए गए हैं जो रेल पटरी की हर छोटी-बडी खामी अथवा त्रुटि को फौरन पकड लेते हैं। मेन लाइन की नियमित जांच करना भी अनिवार्य है। इतनी पुख्ता व्यवस्था के बावजूद एक साल में बार-बार पटरी का टूट जाना और डिब्बों का पटरी से उतर जाना यही साबित करता है कि हर बार कहीं-न-कहीं कोई गंभीर चूक हो रही है। खराब ट्रैक  के अलावा भी रेल हादसे के और कई कारण हैं। भारत में रेल अक्सर ओवर लोडिड होती है और इससे पटरी पर दबाव बढता है और वह टूट जाती है। अधिकतर रेल हादसे इसी वजह से हो रहे हैं। पिछले माह कानपुर के निकट दुर्घटनाग्रस्त इंदौर-पटना एक्सप्रेस से पहले ट्रैक से ओवरलोडिड माल गाडी गुजरी थी। माना जा रहा है कि ओवरलोडिड माल गाडी के गुजरने से ट्रैक में दरार आई थी हालंाकि  इस हादसे की जांच अभी जारी है और  रिपोर्ट  इस माह सरकार को सौंपी जा सकती है। सर्दियों में घनी धुंध भी कई बार हादसे का कारण बनती है। नियमानुसार, हर रेल इंजन में दौ सौ मीटर दूरी दिखाई दिया जाना चाहिए मगर भारतीय रेल इंजन बमुश्किल  दस मीटर दुर देख पाते हैं।  आमतौर पर, पटरी में छोटी-मोटी दरार से हादसे नहीं होते हैं और इसी वजह इन्हें उपेक्षित कर दिया जाता है मगर उतरोत्तर यही मामूली दरार चौडी हो जाती है और हादसे का कारण बनती है। देश  में हर रेल हादसे के बाद सरकार जांच कमेटी बनाती है। कमेटी अपनी रिपोर्ट में कुछ सुझाव देती है। इन्हें आधे-अधूरे मन से लागू किया जाता है। फिर हादसा होता है और कमेटी गठित की जाती है। यह सिलसिला बदस्तूर जारी रहता है पर रेल हाद्से नहीं रुकते। आखिर यह सिला कब तक चलेगा और कब तक देश  के रेल यात्री कीडे-मकोडों की तरह मरते रहेंगे।