प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी और कांग्रेस के “युवराज" राहुल गांधी के बीच जारी “वाक युद्ध“ अब हास्यास्पद लगने लग पडा है। खासकर, कांग्रेस उपाध्यक्ष के “बेतुके“ बोल। प्रधानमंत्री मोदी राहुल गांधी की तुलना में कहीं ज्यादा वाकपटु हैँ । राहुल गांधी ने यह कहकर अपना ही मजाक उडाया है कि संसद में उनके बोलने से “भूकंप“ आ जाएगा। यह किसी भी स्थिति में “वाक पटुता“ नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी ने इस पर चुटकी लेते हुए कहा है कि “ अब भूकंप नहीं आएगा, क्योंकि राहुल गांधी बोल चुके है़। वे युवा नेता हैं और बोलना सीख रहे हैं और उनका काला मन बाहर आ रहा है“। जिन आरोपों पर राहुल गांधी संसद में भूकंप आने का दावा कर रहे थे, उन आरोपो की बाहर आते ही हवा निकल गई क्योंकि दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के सर्वेसर्वा अरविंद केजरीवाल ये आरोप पहले ही लगा चुके थे। राहुल गांधी के पास अरविंद केजरीवाल के आरोपों के अलावा कोई नई जानकारी नहीं थी। सब जानते हैं “ चला हुआ कारतूस दोबारा नहीं चलता“। राहुल गांधी का यह वार भी फुस्स हो गया। फिर उन्होंने गुजरात में प्रधानमंत्री पर सहारा और बिरला समूह द्धारा बतौर मुख्यमंत्री मोदी को करोडों का चंदा देने का आरोप लगाया। मगर यह तीर भी नहीं चला क्योंकि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है कि आरोप गंभीर नहीं है। राहुल बार-बार 12 लाख करोड के स्कैम का हवाला दे रहे हैं मगर यह स्कैम है क्या, इसका खुलासा तक नहीं कर पाए हैं। और जब उनके आरोपों का जनमानस पर कोई खास असर नहीं हुआ तो राहुल ने शेर -ओ- शायरी का सहारा लिया। मशहूर शायर बशीर बद्र के शेर “लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में“ को उद्धृतकरा वाही-वाही लूटने की कोशिश की । प्रधानमंत्री पर ताजा हमले में राहुल गांधी ने “राम-नाम जपना, पराया माल अपना“ जुमले का सहारा लेते हुए फिर अपनी “ वाकपटुता“ का मजाक उडाया है। पहले ऊल-जलूल आरोप और अब जुमले और शेर-ओ-शायरी का सहारा। इससे साफ है राहुल गांधी के पास मोदी पर वार करने के लिए कुछ नया नहीं है। नोटबंदी पर राहुल गांधी प्रधानमंत्री पर जितनी प्रखरता से आक्रमण करते हैं, उतना ही ज्यादा उनका मजाक उड रहा है। वैसे राहुल गांधी को लेकर भाजपाई हमेशा तिरस्कारपूर्ण और उपहास की भाषा का प्रयोग करते रहे हैं जबकि राहुल ने कभी अभद्र भाषा का इस्तेमाल नहीं किया। समकालीन राजनीति आरोप-प्रत्यारोप से आगे निकल कर अब हास्य नौटंकी में बदलती जा रही है। इससे जनता का खूब मनोरंजन हो रहा है। राहुल गांधी भी बराबर चर्चा में है। लगातार प्रधानमंत्री और भाजपा नेताओं के निशाने पर बने रहने से राहुल गांधी खासे चर्चित हो रहे हैं और इस मामले में उन्होंने अरविंद केजरीवाल को भी पीछे छोड दिया है। कांग्रेस की भी यही रणनीति लगती है कि भाजपा नेताओं की अभद्रता और बडबोलेपन का जनता के समक्ष जितना ज्यादा भांडा फूटेगा, कांग्रेस को उतना ही फायदा होगा। मगर जमीनी सच्चाई यह है कि जिस तरह कांग्रेस पूरी तरह से गांधी परिवार पर आश्रित है, उसी तरह आज भाजपा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर पूरी तरह आश्रित है। भाजपाई अब खुद प्रधानमंत्री की इंदिरा गांधी से तुलना करने लग पडे है। कहा जा रहा है कि 1969 में जिस तरह इंदिरा गांधी ने बैकों का राष्ट्रीयकरण करके आलोचकों को नेस्तनाबूद कर दिया था, उसी तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नोटबंदी से काले धन पर प्रहार करके विपक्ष को हाशिए पर ला दिया है। चंडीगढ समेत महाराष्ट्र और गुजरात में हाल ही में सपन्न निकाय चुनाव के जनादेश से साफ है कि देश की जनता प्रधानमंत्री के साथ है और विपक्ष की किसी भी बात को गंभीरता से नहीं ले रही है। नोटबंदी के बाद से 100 से ज्यादा लोगों के बेमौत मारे जाने के बावजूद जनता अगर भाजपा के साथ हैं, तो दीवारों पर लिखी इबादत साफ पढी जा सकती है।
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