गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

समग्र चुनाव सुधार

दुनिया के  विशालतम  भारतीय लोकतंत्र को अविलंब क्रांतिकारी चुनाव सुधार की दरकार है। काला धन, आपराधिक तत्वों की घुसपैठ, मतदाताओं को लुभाने की सियासत, जात-पात और राजनीति में धर्म  के घाल-मेल ने भारत में लोकतंत्र को धन, बल और निहित स्वार्थी राजनीति ( करप्शन, कम्युनिल्जम, कास्टिज्म एंड क्राइम) का मोहताज बना रखा है। देश  में अक्सर चुनाव सुधारों की चर्चा की जाती हैं और हर छोटा-बडा राजनीतिक दल इसकी हिमायत भी करता है, पर क्रांतिकारी चुनाव सुधारों को अमली जामा पहनाने में हर सरकार अपना हाथ खींच लेती है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में अविलंब चुनाव सुधारों का वायदा किया था।  मोदी सरकार को सत्ता में आए अढाई साल से ज्यादा का समय हो गया है मगर इस मामले में अब तक कोई गंभीर पहल नहीं हुई है। फरवरी में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के दृष्टिगत निर्वाचन आयोग ने पहल की है और सरकार से प्रत्याशियों को एक से ज्यादा सीट से चुनाव लडने पर प्रतिबंध की वकालत की है। निर्वाचन आयोग ने यह सिफारिश  भी की है अगर इस छूट को जारी रखना है तो सीट खाली करने वाले प्रत्याशी  से चुनाव खर्च  की राशि  वसूल की जाए। पूरा देश  निर्वाचन आयोग की इस सिफारिश  से सहमत है और इसे तुरंत लागू किया जाना चाहिए। सियासी नेताओं की सुविधा के लिए जनता का पैसा इस तरह से लुटाया नहीं जा सकता।  इसके लिए संसद में चुनाव संबंधी कानून में संशोधन करना पडेगा। संसद के मीजूदा  शीतकालीन सत्र में इस संबंधी कानून लाना मुमकिन नहीं लग रहा है। शीतकालीन सत्र के मात्र दो दिन बचे हैं और बजट सत्र तक पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की चुनाव प्रकिया  शुरु हो जाएगी। पूरी दुनिया इस सच्चाई को जानती है कि भारत में चुनाव के दौरान धन और बल का खुलकर दुरुपयोग किया जाता है। निष्पक्ष , निर्भीक और स्वतंत्र चुनाव लोकतंत्र की बुनियाद है। धन और बल लोकतंत्र की इस बुनियाद को खोखला करते हैं। देश  को आजाद हुए सात दशक हो गए हैं मगर हर चुनाव में धन और बल का दुरुपयोग उतरोत्तर बढता ही जा रहा है। इस सच्चाई को भी पूरी दुनिया जानती है कि भारत में चुनाव के लिए खर्च  की जो वैधानिक सीमा है, अमल मे उससे कहीं ज्यादा खर्च किया जाता है। और सबसे बडी त्रासदी यह है कि चुनाव सपन्न होने के बाद लगभग सभी प्रत्याशी  चुनाव खर्च का झूठा ब्यौरा देते हैं। जाहिर है जिस चुनाव की बुनियाद ही झूठ-फरेब पर रखी जाए, उसके बलबूते लोकतंत्र कैसे फल-फूल सकता है? चुनावों को लेकर देश  की सबसे बडी समस्या भी काला धन है। राजनीतिक दलों को चंदे के रुप में काला धन लेने की खुली छूट है। राजनीतिक दलों को आयकर छूट भी है। चुनाव प्रचार में काले धन का बोलबाला रहता है। कोई भी प्रत्याशी  सफेद कमाई से चुनाव नहीं लडता। बहरहाल, देश  में अगर चुनाव को निष्पक्ष , निर्भीक और स्वतंत्र बनाना है तो सबसे पहले चुनाव में काले धन के दुरुपयोग को पूरी तरह से रोकना होगा। और यह तभी संभव है जब चुनाव की स्टेट फडिंग होगी। देश  को इसके लिए तैयार करना पडेगा। पर सबसे बडा सवाल यह है कि क्या देश  के सभी राजनीतिक दल इसके लिए सहमत होंगे? निर्चाचन आयोग की हालिया रिपोर्ट  में बताया गया है कि लगभग 1866 पंजीकृत राजनीतिक दलों में अधिकतर चुनाव नहीं लडते हैं। निर्वाचन आयोग का आकलन है कि इन दलों को काला धन सफेद करने के लिए इस्तेमाल क्यिा जाता है। राजनीति से अपराधियों को बाहर रखना, जात-पात और राजनीति में धर्म  के घालमेल से बचना और  नैतिक मूल्यों पर सख्ती से अमल करवाना चुनाव सुधार के प्रमुख बिंदु  हैं, जिन पर तुरंत अमल किया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री अगर काला धन को जड से खत्म करने के लिए वाकई संजीदा है, तो उन्हें सबसे पहले  क्रांतिकारी चुनाव सुधार लाने पडेंगे।