रविवार, 11 दिसंबर 2016

“संसद को चलने दें“

नोटबंदी पर संसद के षीतकालीन सत्र की कार्यवाही को निरंतर बाधित करने से चितिंत देश के प्रथम नागरिक (राष्ट्रपति ) को सांसदों को नसीहत देनी पडी है। संसद के मौजूदा  शीतकालीन सत्र की अब तक 17 बैठकों मेंसे बमुश्किल  10 घंटे का कामकाज हुआ है। और कामकाज का निपटान भी ज्ल्दबाजी में किया गया। 16 नवंबर को राज्यसभा की कार्यवाही अगर पांच घंटे चली तो लोकसभा मात्र 10 मिनट की कार्यवाही के बाद विपक्ष के हंगामे में स्थगित कर दी गई। 24 नवंबर को लोकसभा 15 मिनट चली। पूरे नवंबर में यही स्थिति रही। दिसंबर में अब तक  लगभग यही स्थिति रही है । राज्य सभा की स्थिति भी ज्यादा बेहतर नहीं है। 16 नवंबर को छोडकर राज्यसभा में विपक्ष के शोर -शराबे के बीच कार्यवाही  हर दिन बार-बार बाधित होती रही। अभी तक केवल 16 नवंबर को राज्यसभा की कार्यवाही पांच घंटे चल पाई । इसके बाद बाकी दिन राज्यसभा और लोकसभा की कार्यवाही ज्यादा से ज्यादा आधा घंटे ही चली। 8 दिसंबर को लोकसभा में प्राइवेट मेंबर्स डे था और इस दौरान कुछ महत्वपूर्ण कामकाज निपटाया जाना था मगर सदन की कार्यवाही आध घंटे में ही  स्थगित करनी पडी। नियमानुसार संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही कम-से-कम 6 घंटे तो चलनी ही चाहिए। यानी 17 दिन में 102 घंटे का कामकाज तो होना ही चाहिए था। देश के सांसद इस सच्चाई को भली-भांति जानते हैं कि संसद की एक मिनट की कार्यवाही की मौजूदा लागत 3 लाख है। अर्थात संसद की एक घंटे की कार्यवाही पर 1 करोड 80 लाख रु खर्च होते हैं। इस हिसाब से (102-10)  82 घंटे की कार्यवाही जाया करने के लिए विपक्ष ने जनता की कमाई का 165 करोड महज नोटबंदी पर अपनी सियासी रोटियां सेंकने के लिए बर्बाद किए हैं। इसके बावजूद भी जनता को कोई राहत नहीं मिली है। जनमानस से पूछा जाए तो वह कहेगा कि इस नुकसान की भरपाई उन सांसदों के वेतन से की जाए, जो इसके लिए जिम्मेदार है। इसी बात से चिंतित   राष्ट्रपति  प्रणब मुखर्जी ने संसद की कार्यवाही बाधित करने के लिए  विपक्ष को खरी-खोटी सुनाई है। वीरवार को  राष्ट्रपति ने इस बात पर दुख व्यक्त किया कि संसद की कार्यवाही को बाधित करने का जैसे चलन हो गया है। पूरा देश राष्ट्रपति  की इस बात से सहमत होगा कि सांसदों को संसदीय कामकाज निपटाने और जनता की समस्याओं का हल ढूंढने के लिए चुना जाता है, संसद को बाधित करने के लिए नहीं। देश के प्रथम नागरिक को अगर सांसदोॅ को उनके संसदीय जिम्मेदारी का अहसास कराना पडे, तो इससे पता चलता है कि देश की राजनीति का किस हद तक पतन हो चुका है।  बहरहाल, संसद की कार्यवाही बाधित करने से हो रहे नुकसान पर विपक्ष का तर्क है कि जनता ने उन्हें संसद में जन समस्याओं को उठाने के लिए चुना है और नोटबंदी से जनता जिस तरह से हलकान हो रही है, उसके दृष्टिगत  इस मामले को उठाना बनता है। तथापि, सच्चाई यह है कि देश के लगभग सभी सियासी दलों का दोहरा आचरण है। विपक्ष में रहते हुए सब जायज मगर सत्ता में आते ही विपक्ष का सारा विरोध नाजायज। विपक्ष पहले प्रधानंत्री की लोकसभा में उपस्थिति पर अडा रहा और जब प्रधानमंत्री सदन में आए, विपक्ष चर्चा  पर अड गया।  राष्ट्र को अच्छी तरह से याद है कि विपक्ष में रहते हुए भाजपा ने भी 2जी स्कैम और कोयला घोटाले (कोलगेट) पर कई दिनो तक संसद नहीं चलने दी थी। बहरहाल, नोटबंदी पर संसद को नहीं चलने देना समस्या का हल नहीं है। मौजूदा  शीतकालीन सत्र की मात्र चार बैठकें बची  हैं और अभी काफी सारा कामकाज निपटाना बाकी है। कई अहम विधेयक अभी सदन में प्रस्तुत तक नहीं हो पाए हैं। इनमें कर्ज  माफी के लिए नई स्कीम का विधेयक, व्हिसल ब्लोअर्स और विटनेस प्रोटेक्शन  जैसे अहम बिल षामिल हैं। इन विधेयकों के पारित नहीं होने से जनता का ही नुकसान होगा।