मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलन

गुरु नगरी अमृतसर में रविवार को सपन्न दो दिवसीय हार्ट ऑफ एशिया  (मिनिस्टीरियल कांफ्रेंस ऑन हार्ट ऑफ एशिया- इस्तांबुल प्रोसेस ऑफ अफगानिस्तान) सम्मेलन में भारत ने अफगानिस्तान के साथ मिलकर पाकिस्तान को घेरने की कोशिश  की है।  भारत को कम-से-कम इस बात का सकून है कि जो काम गोवा में नहीं हो पाया, अमृतसर में वह पूरा कर लिया गया।  अक्टूबर में गोवा में सपन्न “ब्रिक्स“  शिखर सम्मलेन डिक्लेरेशन में भारत अल-कायदा, जैश -ए-मोहम्मद और लश्कर -ए-तैयबा जैसे दुर्दांत आतंकी संगठनों का उल्लेख करवाने में विफल रहा था। हार्ट ऑफ एशिया सम्मलेन के समापन पर जारी अमृतसर डिक्लेरेशन  में लश्कर  और जैश  को क्षेत्र में  शांति  के लिए सबसे बडा खतरा बताया गया है। अफगानिस्तान  ओर अन्य देशों  द्धारा इस रेसोलुशन का अनुमोदन किए जाने से इस  डिक्लेरेशन  की  विश्सनीयता को पाकिस्तान भी चुनौती नहीं दे सकता। सम्मेलन के दूसरे दिन रविवार को अफगानिस्तान के  राष्ट्रपति अशरफ गनी ने पाकिस्तान प्रधानमंत्री के विदेशी  मामलों के सलाहकर (वास्तव में विदेश  मंत्री) सरताज अजिज  की उपस्थिति में इस्लामाबाद को खरी-खोटी सुनाई।  अफगानिस्तान के विकास के लिए  पाकिस्तान की 500-मिलियन  डॉलर मदद की पेशकश  की  गनी ने जमकर खिल्ली उडाते हुए इस बात पर जोर दिया कि  आतंक का खात्मा करना काबुल के लिए कहीं ज्यादा अपरिहार्य है। अफगानिस्तान तालिबानी आतंक से लडते-लडते बेहाल हो चुका है और अगर इस देश  को वास्तव में आगे बढना है, तो आतंक को परास्त करना होगा। अफगानिस्तान तालिबान को पाकिस्तान का खुला समर्थन है। राष्ट्रपति अशरफ गनी ने रविवार को हार्ट ऑफ  एशिया  सम्मेलन में साफ शब्दों में कहा कि अगर पाकिस्तान तालिबान की मदद करना छोड दे, तो अफगानी सेना एक माह में उसका सफाया कर सकती है। पाकिस्तान जिस तरह जैश  और लश्कर को  भारत में विध्वसंक गतिविधियों के लिए हर तरह से मदद दे रहा है, उसी तरह इस्लामाबाद तालिबानी आतंकियों की मदद कर रहा है। भारत से कहीं ज्यादा  अफगानिस्तान ने पाकिस्तान प्रायोजित  विध्वसंक गतिविधियां झेली है। यानी दोनों देशों  का  दर्द  एक जैसा है। अमृतसर सम्मेलन ने अपना पूरा ध्यान तीन ज्वलंत मुद्दों पर केन्द्रित रखाः अफगानिस्तान में अमन-चैन स्थापित करने के लिए आतंक को मिलकर परास्त करना, विकास को तेज करने के लिए कनेक्टिविटी मुहैया कराना और आर्थिक खुशाहली सुनिश्चित करना।  अफगानिस्तान में तालिबानी आतंक के रहते न तो विकास संभव है और न ही अमन-चैन। वस्तुतः, अमन-चैन के बगैर किसी भी देश  में आर्थिक विकास संभव नहीं है। आतंक के बावजूद 2002 के बाद से अफगानिस्तान उदार अंतरराष्ट्रीय मदद और विदेशों  में कार्यरत अफगानियों से मिलने वाली मुद्रा से  तेजी से आगे बढा है। मगर पाकिस्तान भारत की तरक्की की तरह अफगानिस्तान की आर्थिक उन्नति को भी पचा नहीं पा रहा है। इसीलिए, आतंकियों की मदद करके भारत और पाकिस्तान को अस्थिर करने की हरचंद कोषिष कर रहा है। अमृतसर डिक्लेरेशन में साफ-साफ कहा गया है कि आतंक हार्ट  ऑफ एशिया की  शांति  और स्थायित्व के लिए सबसे बडा खतरा है।  डिक्लेरेशन में आतंकियों की मदद करने वालों को चेताया गया है कि वे आतंक को पालना-पोसना बंद कर दे। बगैर नाम लिए इशारा पाकिस्तान की ओर है हालांकि पाकिस्तान ने इस सम्मेलन में  शिरकत करके क्षेत्र में अलग-थलग पडने से बचने की कोशिश  की है। तथापि सम्मेलन में अफगानिस्तान द्धारा  खरी-खोटी सुनाई जाने पर  पाकिस्तान को अपमान का घूंट पीना पडा है। पाकिस्तान प्रधानमंत्री के सलाहकार सरताज अजिज की भारत के नेताओं से बातचीत नहीं होने से भी इस्लामाबाद को फजीहत होना पडा है। अमृतसर  डिक्लेरेशन में और भी कईं बातें हैं जो पाकिस्तान के कान खींचने के लिए पर्याप्त है मगर इस्लामबाद बडा डीढ है। पाकिस्तान को इन सब बातों से कोई फर्क  नहीं पडता है। दरअसल, पाकिस्तान के सियासी नेता पूरी तरह से सेना के प्रभाव में है और पाकी सेना  भारत और अफगानिस्तान को अस्थिर करने में लगी हुई है। इन हालात में पाकिस्तान को अगर नकेल डालनी है , तो चीन को भी साथ लेना होगा।