नोटबंदी के पचास दिन पूरे होते ही मोदी सरकार ने देश के जनमानस की पुलिसिंग का काम भी शुरु कर दिया है। बुधवार को सरकार ने अध्यादेश जारी करके पुराने नोटों को दंडनीय अपराध बना दिया है। अध्यादेश के अनुसार 31 मार्च के बाद से अगर किसी व्यक्ति के पास 10 से ज्यादा के 500 और 1000 रु के पुराने नोट पाए गए, तो उसे जुर्माना भरना पडेगा और चार साल की जेल भी हो सकती है । यह कानून 1 जनवरी से ही लागू हो जाएगा मगर सरकार ने लोगों को 1 जनवरी से 31 मार्च तक पुराने नोट रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के विशेष काउंटर्स पर बदलने का विकल्प दिया है। अध्यादेश में यह व्यवस्था भी है कि पुराने नोटों को लेकर कोई भी व्यक्ति कानूनी दावा नहीं कर सकता। 1978 में मोरारजी देसाई की जनता सरकार ने 1000 और 5000 रु के नोट बंद करने के बाद भी ऐसा ही अध्यादेश जारी किया था। तब भाजपा (तत्कालीन जनसंघ) भी इसी सरकार का हिस्सा थी। तब इसका कुछ असर पडा था मगर ताजा स्थिति में मोदी सरकार की इस कवायद का कोई ज्यादा प्रभाव नहीं फ्डने जा रहा है। ताजा रिपोर्ट के अनुसार नोटबंदी के बाद से 28 दिसंबर तक सरकार के पास 15.4 लाख करोड रु के 500 और 1000 रु के पुराने नोट मेंसे 14 लाख करोड रु जमा हो चुके हैं। यानी सिस्टम में अब 1.4 लाख करोड के पुराने नोट ही बचे है। इसके यह अभिप्राय हैं कि देश में 1.4 लाख करोड रु का काला धन है जबकि सरकार का अपना आकलन है कि कम-से-कम तीन लाख करोड के पुराने नोट काले धन के रुप में थे और जमा नहीं किए जाएंगे। इन आंकडों से इतना तो स्पष्ट है कि नोटबंदी का काला धन बाहर निकालने का जो मूल मकसद था, वह हासिल नहीं किया जा सका है। नोटबंदी से सिर्फ लोगों को खामख्वाह का कष्ट और परेशानी झेलनी पड रही है। प्रधानमंत्री ने देश के लोगों से नोटबंदी के लिए 50 दिन का समय मांगा था और बुधवार को यह समय सीमा समाप्त हो गई है। देश के अधिकतर हिस्सों में अभी भी नगदी का संकट बना हुआ है। लोगों को एटीएम से 2500 रु से ज्यादा की नगदी नहीं निकल रही है और बेंकों से एक सप्ताह में 24,000 से ज्यादा की रकम निकालने पर अभी भी रोक है। बैंकों मेँ ग्राहकों को 24,000 रु की जगह ज्यादा से ज्यादा 6,000 रु की नगदी ही दी जा रही है। बैंकों में नगदी का भीषण संकट है और इसी स्थिति के दृष्टिगत बैंको ने सरकार से आग्रह किया है कि नगदी निकालने पर लगी सीमा को 30 दिसंबर से आगे भी तब तक जारी रखी जाए जब तक उन्हें पर्याप्त नगदी नहीं मिल जाती। सरकार ने खुद बडे बैंकर्स से इस मामले में राय मांगी थी। बैंकों का आकलन है कि अगर नगदी निकालने की सीमा ह्टा दी जाती है तो देश में एकाएक नगदी संकट उत्पन्न हो सकता है। सीमा खत्म होते ही लोग बेंकों से अधिकाधिक नगदी निकाल सकते हैं मगर बेंकों के पास नोटबंदी के 50 दिन बाद भी पर्याप्त कैश नहीं है। भारत में आपातकाल के दौरान जमाखोरी की बुरी लत है। नोटबंदी के बाद से लोग-बाग डरे हुए हैं और उन्हें लग रहा है कि नगदी का संकट अभी लंबे समय तक जारी रह सकता है। इस स्थिति में अगर नगदी निकालने पर लगी सीमा हटा दी जाती है, तो देश में फिर कैश की कमी हो सकती है। बहरहाल, नोटबंदी ने पूरी अर्थव्यवस्था को तहस-नहस कर दिया है। फैक्ट्री उत्पादन में 30 से 50 फीसदी की गिरावट आ चुकी है। नवबर और दिसंबर में एफएमसीजी ( फास्ट मूविंग कंज्युमर गुडस) की बिक्री में 30 फीसदी की गिरावट आई है। रोजगार के अवसर न के बराबर हैं और कारोबार ठंडा पडा है। इस पर भी मोदी सरकार लोगों की पुलिसिंग करे तो देश की अर्थव्यवस्था का तबाह होना तय है।
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