सोमवार, 19 दिसंबर 2016

नोटबंदी : “दुविधा में दोऊ गए, माया मिली, न राम“।

नोटबंदी के बाद अब मोदी सरकार ने कैशलेस अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करने के लिए कमर कस ली है। वीरवार को सरकार ने डिजिटल पेमेंट को बढावा देने के लिए 340 करोड रु के कैश  इनाम देने का ऐलान किया। डिजिटल पेमेंट करने वाले ग्राहकों और कारोबारियों को हर रोज और साप्ताहिक ड्रा निकाले जाएंगें और 100 दिन बाद एक करोड रु का इनाम दिया जाएगा। अगले सौ दिन तक 15,000 ग्राहकों को एक-एक हजार रु का इनाम दिया जाएगा। 1 लाख, 10 हजार और 5 हजार के तीन साप्ताहिक इनाम भी होंगे। कारोबारियों को 50 हजार, 5 हजार और 1 हजार रु के तीन-तीन साप्ताहिक इनाम दिए जाएंगें। 15 अप्रैल को एक करोड, 50 लाख और 25 लाख रु के मेगा इनाम दिए जाएंगे। मोदी सरकार को भरोसा है कि नगद इनाम दिए जाने से देश  में डिजिटल पेमेंट में इजाफा होगा। तथापि जमीनी हकीकत यह है कि देश  को अभी डिजिटल पेमेंट व्यवस्था को अपनाने में कई साल लग सकते हैं। आंकडे इस बात के गवाह हैं। भारत में 70 फीसदी जनता के अभी भी बैंकों में कोई बैंक खाते नहीं है और उनका सारा लेन-देन कैश  में चलता है। आयकर विभाग के अनुसार देश  में इस समय कुल मिलाकर 44 करोड बैंक खाते हैं और 30 फीसदी खाते एक व्यक्ति या परिवार के हैं। लगभग 22 करोड जन-धन खाते हैं। 16 नवंबर तक जनधन खातों में 64,252 करोड रु की राशि जमा हो चुकी थी। मोदी सरकार की यह बडी उपलब्धि है। मगर समस्या यह है कि जन-धन के अधिकतर खाते क्रियाशील नहीं है। देश  की 45 फीसदी आबादी ( सकल घरेलू उत्पाद का )  असंगठित क्षेत्र में है और यह पूरी तरह से नगदी पर आश्रित है। 3.85 करोड के करीब लघु और सीमांत कारोबारी हैं और 21,000 के करीब असंगठित मंडियां। इन सब में सारा लेनदेन नगदी भी किया जाता है। देश  के अग्रणी औद्योगिक संगठन का आकलन है कि फॉस्ट मूविंग कंज्युमर गुडस (एफएमचीजी) का 93 फीसदी कारोबार करियाना स्टोर्स से किया जाता है और अधिकतर खरीदारी नगदी में की जाती है। मात्र एक फीसदी खरीदारी डिजिटल पेमेंट द्धारा  की जाती है।  शहरो में भले ही पेटीएम, ईवॉलेट जैसी डिजिटल पेमेंट सुविधा हो सकती है मगर ग्रामीण क्षेत्र अभी भी इस सुविधा से वंचित है। केवल 1.30 करोड लोगों के पास मोबाइल वॉलेट की सुविधा है। भारत में 95 फीसदी लोग अपने डेबिट कार्ड एटीएम से मात्र केश  निकालने के लिए इस्तेमाल करते है। 5 फीसदी लोग ही डेबिट अथवा क्रेडिट कार्ड  से खरीदारी करते हैं। इन आंकडों से साफ है कि देश  को कैशलैश  बनने में अभी कई साल लग सकते हैं और वह भी तब अगर सरकार कैशलैस बनने के लिए गांव-गांव डिजिटल पेमेंट की सुविधाएं मुहैया कराए।  नोटबंदी का मकसद अगर काले धन को बाहर लाना है, तो यह इस मामले में बुरी तरह से विफल हुई है। सरकार ने खुद माना है कि 14.17 लाख करोड की नोटबंदी मेंसे अब तक 12 लाख करोड से ज्यादा के पुराने नोट बैंकों में जमा कराए जा चुके हैं और 31 दिसंबर तक यह आंकडा  14 लाख करोड तक पहुंच सकता है। इसके यह अभिप्राय है कि देश  में काला धन बाहर आया ही नहीं और अगर थोडा बहुत आया भी, 44 करोड बैंक खाते खंगालने के बाद ही इसका पता चलेगा। वस्तु स्थिति यह है कि देश  की कुल आय (जीडीपी) का 3.75 फीसदी काला धन के रुप में छिपा हुआ है और इस मेंसे मात्र 7.3 फीसदी नगदी में रखा गया है। बाकी का काला धन चल-अचल संपत्ति में छिपाया गया है। और जहां तक नकली नोटों का सवाल है आरबीआई का ही आकलन है कि दस लाख के नोटों में सिर्फ  250 रु नकली है। निष्कर्ष   यह है कि नोटबंदी से “दुविधा में दोऊ गए,  माया मिली, न राम“। बस आम आदमी को खामख्वाह का  कष्ट  झेलना पड रहा है।