शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

नोटबंदी और ग्रोथ

देश  के लिए यह राहत की बात है कि बीते तिमाही (जुलाई-सितंबर) में  सकल घरेलू उत्पाद(जीडीपी) ग्रोथ रेट में पहली तिमाही (अप्रैल-जून) की तुलना में 0.2 फीसदी की वृद्धि दर्ज  हुई है। पहली तिमाही में जीडीपी की ग्रोथ 7.1 फीसदी थी और दूसरी तिमाही में यह 7.3 फीसदी । एक साल पहले इसी अवधि में जीडीपी ग्रोथ रेट 7.6 फीसदी थी। अक्टूबर में   उधोग  की   धडकन माने जाने वाले आठ उधोगों के कोर उत्पादन में भी एक फीसदी की वृद्धि दर्ज  हुई है। तथापि यह राहत जल्द ही काफूर हो सकती है। एक साल बाद जीडीपी ग्रोथ रेट में 0.4 फीसदी की गिरावट चिंता का विषय है। ताजा आंकडों से लग रहा है कि सरकार का पिछले साल के ग्रोथ रेट को पार करने का लक्ष्य पूरा नहीं हो पाएगा। पिछले साल जीडीपी विकास दर   7.6 फीसदी रही थी। ताजा स्थिति में इस साल (2016-17)  7.6 फीसदी ग्रोथ हासिल करना भी चुनौतीपूर्ण लग रहा है। 8 नवंबर को प्रधानमंत्री द्धारा 500 और 1000 रु के नोट बंद किए जाने से अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पडा है और नोटबंदी के बाद से सकल घरेलू उत्पादन में  शिथिलता देखी गई है। बाजार में नगदी के संकट से फॉस्ट ग्रोथ के लिए आवश्यक   तत्व अचानक गायब हो गए हैं। समय पर बुआई नहीं होने और नगदी संकट से समय पर खाद और बीज नहीं मिलने के कारण रबी की फसल का उत्पादन लक्ष्य हासिल करना मुमकिन नहीं लग रहा है। दूसरी तिमाही में जीडीपी ग्रोथ रेट में मामूली वृद्धि कृषि  में 3.3 फीसदी ग्रोथ के कारण मुमकिन हुई है। पहली तिमाही में कृषि  में अपेक्षाकृत ग्रोथ नहीं होने से जीडीपी में वृद्धि दर  7.1 फीसदी दर्ज हो पाई थी । रबी सीजन में कृषि  की विकास दर  3.3 फीसदी रहेगी, इसकी क्षीण संभावनाएं है। भारतीय अर्थव्यवस्था की तेज ग्रोथ का सबसे बडा कारण हैः लोगों का संस्थागत गवर्नेंस पर अटूट भरोसा। ग्रामीण क्षेत्रों की आर्थिक गतिविधियां तो इसी भरोसे पर चलती है। देश  में पहली बार नोटबंदी ने जनमानस के इस भरोसे को तोडा है। विख्यात अर्थषास्त्री नोबेल पुरुस्कार विजेता अमर्त्य सेन का आकलन है कि नोटबंदी ने भारतीय अर्थव्यवस्था की जड पर हमला किया है। पिछले बीस साल से भारतीय अर्थव्यवस्था में व्याप्त तेजी की प्रमुख वजह भी भरोसा ही है। लोग-बाग सरकार द्धारा जारी नोटों पर भरोसा करते है और अगर सरकार खुद नोटबंदी से इस भरोसे को तोड दे, तो लोगों का बैंकिंग व्यवस्था पर भरोसा उठना तय है। लोग अपने ही खातों से पैसा नहीं निकाल पाएं, तो वे बैंकों में अपना धन जमा क्यों करेंगे? देश  में हर छोटा-बडा यही कह रहा है कि नोटबंदी का मकसद तो अच्छा है मगर इसका कार्यवन्यन एकदम “निरंकुश “ है। नोटबंदी को लगभग एक महीना होने जा रहा है, मगर लोगों की परेशानियां कम होने का नाम नहीं ले रही है। नगदी की आपाधापी में लोगों को काफी कुछ खोना पडा है। दुनिया में पहली बार नोटबंदी (विमुद्रीकरण) के कारण  लोगों को अपनी जान तक गंवानी पडी है। सियासी नेताओं समेत बडे लोगों को कोई परेशानी नहीं है। पुराने नोट बदलने  के लिए न तो उन्हें कतार में खडा होना पडता है , और न ही  उन्हें नगदी की समस्या झेलनी पडी है। नोटबंदी से टैक्स चोरी करके छिपाया गया धन सरकारी खजाने में आने से जितना फायदा होगा, उससे कही ज्यादा नुकसान अर्थव्यवस्था की सतत ग्रोथ के रुक जाने से होगा। सरकार ने खुद माना है कि हालात सामान्य होने में चार माह लग सकते है। निष्कर्ष   यह है कि नोटबंदी से जनता हलकान है। उत्पादन और कारोबार पर प्रतिकूल असर पड रहा है।  उत्पादन रुक जाने से रोजगार के अवसर भी कम हो गए है। रोजगार नहीं है तो आय भी नहीं है। और इंकम नहीं होने से मांग भी नहीं है। इस तरह सारी की सारी आर्थिक गतिविधियां  शिथिल पड गई हैं। नोटबंदी दीर्घकालीन में असरदार होती है या नहीं, मगर अल्पकाल में इसका प्रतिकूल असर पड रहा है।