भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के नए गवर्नर और ब्याज दरें तय करने के लिए गठित छह-सदस्यीय समिति ने ब्याज न घटाकर लोगों को “कंगाली में आटा गीला“ की सौगात दी है। एक माह पहले आठ नवंबर को 500 एवं 1000 रु के नोट बंद किए जाने के बाद से देश का लगभग हर आर्थिक और वित्तीय विशेषज्ञ नोटबंदी के बाद उपजी “नगदी के संकट“ की स्थिति के दृष्टिगत ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद कर रहा था। विभिन्न एजेंसियों द्वारा अर्थशास्त्रियों एवं वित्तीय विशेषज्ञों की राय पर करवाए गए हर सर्वेक्षण में भी ब्याज कटौती की उम्मीद जताई गई थी। मगर आरबीआई के गर्वनर और समिति ने ब्याज दरों को यथावत रख कर सभी को चौंकाया दिया है और महंगे कर्ज और नगदी के संकट से त्रस्त लोगों को राहत देना मुनासिब नहीं समझा है। उन्हें मुद्रा-स्फीति की ज्यादा चिंता है। नोटबंदी के बाद से देश की अर्थव्यवस्था में ग्रोथ की रफ्तार काफी धीमी पड गई है। आरबीआई ने खुद माना है कि नोटबंदी से ग्रोथ पर प्रतिकूल असर पडा है। इसीलिए आरबीआई ने चालू वित्तीय के लिए सकल वैल्यू एडिड ग्रोथ आउटलुक को 7.6 फीसदी से घटाकर 7.1 फीसदी कर दिया है। एक माह से भी कम समय में अगर आरबीआई को ग्रोथ आउटलुक 0.5 फीसदी घटाना पडा है, जाहिर है अगले कुछ महीनों में वैल्यू एडिड ग्रोथ की रफ्तार और भी धीमी पड सकती है। बुधवार को ही एक सर्वेक्षण में बताया गया कि नोटबंदी से स्टॉक मार्केट को भी खासा नुकसान हुआ है और अगले साल सेंसेक्स के रिकार्ड हाई छूने की जो उम्मीद है, उस पर पानी फिर गया। बुधवार को आरबीआई की मौद्रिक नीति घोषित होते ही सेंसेक्स और निफ्टी दोनों ही लुढक गए। नोबेल पुरुस्कार से सम्मानित ख्यातिप्राप्त अमर्त्य सेन समेत देश के लगभग सभी अर्थशास्त्री इस बात पर सहमत है कि नगदी पर फल-फूल रही भारतीय अर्थव्यवस्था से एकाएक केश की आक्सीजन बंद कर देने से ग्रोथ पर बहुत बुरा असर पड सकता है। पांच सौ और एक हजार रु के नोट बंद किए जाने से 86 फीसदी नगदी अर्थव्यवस्था से गायब हो गई है। नोटबंदी को एक माह का समय हो गया है, मगर इसकी जगह अभी बमुश्किल 27 फीसदी कैश भी मार्केट में आ पाया है। कालेधन को समाप्त करने के मोदी सरकार के दावे भी खोखले साबित हो रहे है़। आम आदमी को मामूली सी नगदी के लिए भी तरसना पड रहा है, मगर भ्रष्ट और टैक्स चोर आराम से दो हजार के करोडों के नए नोट जमा कर रहे हैं। बगंलुरु के दो इजीनियरों के घर से 4.5 करोड रु के नए नोट मिलना यही साबित करता है कि सरकार द्धारा जारी नए नोट आम आदमी को भले ही न मिले पर भ्रष्ट और काले कमाई करने वालों को आसानी से मिल रहे हैं। आए दिन लाखों के नए नोट जब्त किए जाने के मामले भी यही कह रहे हैं। आरबीआई को लगता है कि तेल की अंतरराश्ट्रीय कीमतों में आ रहे उछाल से मुद्रा-स्फीति बढ सकती है। भारत अपनी तेल खपत का 80 फीसदी आयात करता है। इस स्थिति में तेल आयात से मुद्रा-स्फीति के आयात का खतरा भी बना रहता है। आरबीआई ने ब्याज दरें यथावत रखने के लिए यह तर्क भी दिया है कि मुद्रा-स्फीति का खतरा अभी पूरी तरह से टला नहीं है। आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुुराम राजन भी ब्याज दरें नहीं बढाने के लिए यही तर्क दिया करते थे। तब वित्त मंत्री अरुण जेटली समेत भाजपाई राजन की मुद्रा-स्फीति नियंत्रण की इस नीति के मुखर आलोचक हुआ करते थे। अब उम्मीद की जा सकती है कि आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल और समिति के सदस्य एक फरवरी को पेश होने जा रहे बजट के बाद फरवरी को जारी होने वाली मौद्रिक नीति में ब्याज दरे में कुछ कटौती दें। तब तक नोटबंदी के परिणाम भी सामने आ जाएंगें और बजट में मुद्रा-स्फीति को रोकने के लिए सरकार क्या कदम उठाने जा रही है, इसका भी पता चल जाएगा। अब लोगों को फरवरी तक इंतजार करने के सिवा कोई चारा नहीं है।
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