देश की शीर्ष अदालत उदंड भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) को सही मार्ग पर लाने के लिए कृतसंकल्प है। राजनीति दांव-पेंच में माहिर बीसीसीआई की उदंडता इस कद्र बढ गई है कि देश की शीर्ष दालत के आदेशों की भी खिल्ल्लियां उडाई जा रही है। न्यायपालिका न तो भावनाओं में बहती है और न ही ऊंची-नीच का ख्याल करती है। लोढा समिति की सिफारिशों को संजीदगी से लागू करने की बजाए बीसीसीआई तरह-तरह के बहाने गढ कर अदालत की अवमानना करने पर आमादा है। कभी कहा जा रहा है कि लोढा समिति की सिफारिशे लागू करने से सरकार का दखल बढेगा, तो कभी चैंपियन ट्राफी और आईपीएल की आड ली जा रही है। देश की न्यायपलिका की अवमानना का मतलब संविधान का अपमान है। बीसीसीआई अध्यक्ष सांसद अनुराग ठाकुर यह बात जानते हुए भी लोढा समिति की सिफारिशों को लागू करने से इसलिए बच रहे हैं क्योंकि सुधार लाने से बीसीसीआई के पदाधिकारी खुद इसकी जद में आ जाएंगे।समिति ने बीसीसीआई पदाधिकारी के लिए अधिकतम दो टर्म तय की है ओर अनुराग ठाकुर 14 साल से हिमाचल क्रोकेट अस्सोसिएशन पर कब्ज़ा जमाये हुए हैं । मंत्री औरनौकरशाहों को बीसीसीआई से बाहर रखना लोढा समिति की प्रमुख सिफारिशों में शामिल है। समिति ने एक राज्य, एक वोट की नीति लागू करने और प्रॉक्सी वोट को समाप्त करने की भी सिफारिश की है। एक राज्य, एक वोट की सिफारिष लागू किए जाने से महाराष्ट्र जैसे राज्य को तगडा झटका लग सकता है। इस समय इस राज्य में मुंबई, विदर्भ और महाराष्ट्र के नाम से तीन-तीन क्रिकेट संगठन हैं और तीनों को अलग-अलग वोट का अधिकार है। यानी महाराष्ट्र के पास तीन वोट है। जाहिर है, अन्य राज्यों की अपेक्षा महाराष्ट्र की वोटिंग पॉवर कहीं ज्यादा है। इसलिए बीसीसीआई में महाराष्ट्र का दबदबा रहता है। मंत्रियों और नौकरशाहों को बीसीसीआई से बाहर रखना, लोढा समिति की क्रांतिकारी सिफारिश है। बीसीसीआई ही नहीं देश के अधिकतर खेल संगठनों पर सियासी नेताओं का कब्जा है। गल्ली-मोहल्ले में क्रिकेट खेलने वाला नेता भी बीसीसीआई का पदाधिकारी बन सकता है। क्रिकेट न भी खेला हो, तब भी बीसीसीआई का अध्यक्ष बन सकता है। वीरवार को देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस टीएस ठाकुर ने अनुराग ठाकुर को क्रिकेटर बताए जाने पर तंज कसते हुए कहा “ मैं भी जजों की टीम का कप्तान हूं। तो क्या में क्रिकेटर बन गया?“ बहरहाल, सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार को साफ-साफ षब्दों में कहा कि बीसीसीआई और राज्यों की क्रिकेट अस्सोसिएशन्स को लोढा समिति की सिफारिशे लागू करनी ही होगी। जब तक स्टेट अस्सोसिएश न्स समिति की इन्हें लागू नहीं करतीं, उन्हें बीसीसीआई द्वारा 21 सितंबर को दी गई ग्रांट जारी नहीं की जाएगी। अदालत ने इंफरास्ट्रक्चर की आड में बीसीसीआई द्वारा स्टेट अस्सोसिएशन्स को भारी-भरकम ग्रांट जारी करने पर नाराजगी जताई है। इससे पहले लोढा समिति ने स्टेट अस्सोसिएशन्स को भारी-भरकम ग्रांट जारी करने पर सख्त ऐतराज जताया था और बैंकों को बीसीसीआई के खाते फ्रीज तक करने को कहा था। सर्वोच्च न्यायालय ने यह बात भी साफ कर दी है कि आधे-अधूरे (चैरी-पिक्ड रिफॉर्म) सुधार नहीं चलेंगे। बीसीसीआई को लोढा समिति की सिफारिशों को एक-मुश्त लागू करना होगा और अगर बीसीसीआई ऐसा नहीं कर सकती, तो सर्वोच्च न्यायालय इन्हें लागू करने के लिए प्रशासक नियुक्त करेगा ै। सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि बीसीसीआई प्रमुख अनुराग ठाकुर ने अब तक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट संघ (आईसीसी) की इस बात पर राय नहीं ली है कि लोढा समिति की सिफारिशे लागू करने से बीसीसीआई में सरकार का दखल बढेगा। इस सफेद झूठ पर अदालत बेहद खफा है। बीसीसीआई के पास अभी भी वक्त है और उसे समय रहते संभल जाना चाहिए। वैसे देश की शीर्ष अदालत बीसीसीआई को राजनीतिक नेताओं के शिकंजे से मुक्त करके ही रहेगी। अब तक देश में हर क्रांतिकारी सुधार लाने की पहल अब न्यायपालिका ही करती रही है।
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