सेना द्धारा सरकार को सर्जिकल स्ट्राइक का वीडियो सौंपे जाने से उन बडबोले नेताओं की जुबान पर ताला लग जाना चाहिए, जो जवानो की बहादुरी की मीनमेख निकाल रहे हैं। 28 सितंबर को पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में भारतीय सेना ने सटीक सर्जिकल स्ट्राइक से आतंकियों के आठ शिविरों को नेस्तनाबूद कर दिया था। पूरी दुनिया जब भारतीय सेना की इस बहादुरी की कायल हो रही थी, देश के कुछ नेता इस पर सवाल उठा रहे थे। उनकी इस हिमाकत से पाकिस्तान के सफेद झूठ को बल मिला है। यह स्थिति बेहद दुखद है कि एक ओर जहां पाकिस्तानी अफसर और पुलिस भी इस बात को मान रही है कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में भारतीय सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक की थी, वहीं काग्रेस और आप को पाकिस्तान के झूठ पर भरोसा है। कहते हैं “झूठ के पैर नहीं होते“। सर्जिकल स्ट्राईक पर संदेह करने वालों का “झूठ“ भी पलक झपते ही धराशायी हो गया। राजनीतिक हो-हल्ले के कारण सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक पर 90 मिनट के वीडियो को सरकार के सुपुर्द कर दिया। इस वीडियो के सामने आने पर अब कांग्रेस और आम आदमी पार्टी बगले झांक रही है। रक्षा विशेषज्ञ और सरकार इस वीडियो को सार्वजनिक करने के सख्त खिलाफ थे। तथापि, राजनीति विवाद से आहत मोदी सरकार ने सर्जिकल स्ट्राइक का वीडियो मंगवाया। अब इस मामले में पहले जैसी एकता बनाए रखने के लिए सरकार वीडियो को रक्षा मामलों की संसदीय स्थायी समिति को सौंप सकती है। समिति की 6 अक्टूबर (वीरवार) को बैठक थी, जो ऐन समय पर 14 अक्टूबर के लिए स्थगित कर दी गई। इससे उम्मीद की जा सकती है कि उस दिन सर्जिक्ल स्ट्राइक से जुडी कुछ तस्वीरें समिति के समक्ष पेश की जा सकती हैं। बहरहाल, सेना की सर्जिकल स्ट्राइक को राजनीतिक स्वार्थ का मुद्दा बनाना अति निंदनीय है। देश की अखंडता और सुरक्षा के मामले में अब तक देश हमेशा एक साथ खडा होता रहा है। 1952 का भारत-चीन युद्ध हो अथवा 1965 और 1971 की भारत-पाकिस्तान जंग या कारगिल युद्ध, पूरा देश एक साथ शहीदों की कुर्बानियों पर रोया और उन्हें श्रंदा सुमन भेंट किए। 1971 के भारत-पाकिस्तान जंग में देश की जबरदस्त फतेह के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने सभी राजनीतिक मदभेद भुलाकर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को “दुर्गा का अवतार“ बताया था। इस युद्ध में पाकिस्तान के लगभग एक लाख सैनिकों ने भारतीय सेना के समक्ष आत्म समर्पण किया था। इसी युद्ध के फलस्वरुप पाकिस्तान विभाजित हुआ और बांग्लादेश का उदय हुआ था। कारगिल युद्ध के समय भी देश के सभी राजनीतिक दल सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खडे थे। पहली बार देश में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने अपनी ही सेना की काबलियत पर संदेह जताया है। निसंदेह, लोकतंत्र पारदर्शिता और स्वस्थ आलोचना पर चलता है मगर किसी भी लोकतांत्रिक देश में सुरक्षा को लेकर अनावश्यक सवाल खडे नहीं किए जाते हैं। भावातिरेक होकर सेना की काबलियत पर संदेह करना देशभक्ति पर संदेह जताना जैसा है। भाजपा द्धारा सर्जिकल स्ट्राइक को प्रचार का मुद्दा बनाए जाने पर कांग्रेस के ऐतराज को जायज माना जा सकता है। मगर इसके लिए सर्जिकल स्ट्राइक पर राजनीति की जाए, यह बात भी हजम नहीं हो रही है। कांग्रेस और संप्रग में उसके सहयोगी दल राकांपा का कहना है कि मनमोहन सरकार के समय भी तीन-तीन सर्जिकल ऑपरेशन किए गए थे, मगर सरकार ने इन्हें प्रचार का मुद्दा नहीं बनाया। अब इस बात पर भी विवाद हो रहा है कि क्या संप्रग सरकार के समय सर्जिकल स्ट्राइक किए गए थे़? बहरहाल, सैन्य कार्रवाई को राजनीति का मुददा नहीं बनाया जाना चाहिए। काग्रेस लंबे समय तक सत्ता में रही है और इसे बखूबी मालूम है कि सुरक्षा को लेकर कितनी पारदर्शिता बरती जानी चाहिए। और अब मोदी सरकार को तय करना है कि सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर कितनी पारदर्शिता बरती जाए।
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