शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2016

For God Sake Please Spare Army From Becoming Victim Of "dity Politics"

हर छोटे-बडे मुद्दे को सियासी रंगत देना और इसकी आड में राजनीतिक रोटियां सेंकना समकालीन भारतीय नेताओं की फितरत बन गई है। सर्जिकल स्ट्राइक के मामले को ही लें। सितंबर के आखिरी सप्ताह सेना की इस अदम्य साहसिक कार्रवाई के सार्वजनिक होने के बाद से आज तक ऐसा कोई दिन नहीं गया जब इस पर सियासत न की गई हो। सतारूढ दल सर्जिकल स्ट्राइक को राजनीतिक तौर पर भुनाने में कोई कसर नहीं छोड रहा है और विपक्ष  सतारूढ दल को आइना दिखाने की हर चंद  कोशिश  कर रहा है। इस क्रम में देश  की छवि को जो क्षति पहुंच रही है, उसकी किसी को परवाह नहीं है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यधपि  अपने सहयोगियो को सर्जिकल स्ट्राइक पर  ढोल न पीटने (चेस्ट थंपिंग) की नसीहत दे रखी है मगर इसके बावजूद इसे सरकार की बडी उपलब्धि बताया जा रहा है। सेना पूरे देश  का गौरव होती है और उसकी हर शौर्यता पर  सभी देशवासी नाज करते हैं। इस बात के दृष्टिगत सैन्य कार्रवाई को किसी दल या सरकार विशेष  की उपलब्धि बताना सही नही है। अब तक यही रिवायत रही है मगर मोदी सरकार ने इसे तोड दिया है, आए दिन सर्जिकल स्ट्राइक को मोदी सरकार  की “महान उपलब्धि“ बताकर अभूतपूर्व  शौर्य दास्तां का “अपमान“ किया जा रहा है।  बुधवार को रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने यह कहकर नया विवाद खडा कर दिया है कि सेना ने पहली बार सर्जिकल स्ट्राइक की है और ऐसा करने के लिए मोदी सरकार ने पहल की है। इससे पहले सेना ने जो भी कार्रवाई की थी, उसमें सरकार का कोई दखल नहीं था। रक्षा मंत्री के इस वक्तव्य से कांगेस उबल पडी है और रक्षा मंत्री के बयान को “सफेद झूठ“ करार दिया है। रक्षा मंत्री नेे अपने कथन  से जून 2015 में सेना की म्यांमार में सटीक सर्जिकल स्ट्राइक पर ही सवाल खडा कर दिया है। रक्षा मंत्री के ताजा बयान की माने तो म्यांमार सीमा पर सेना की कार्रवाई विशुद्ध  स्थानीय सैन्य कार्रवाई थी और सरकार का इसमें कोई दखल नहीं था। लगभग 40 मिनट की  इस सर्जिकल कार्रवाई में सैनिकों ने 158 आतंकियों को मार गिराया था। इस कार्रवाई पर तब मीडिया में प्रकाशित समाचारों के अनुसार सात जून 2015 को प्रधानमंत्री के  बांग्लादेश  से लौटते ही इस कार्रवाई के लिए उनकी अनुमति ले ली गई थी । विदेश  मंत्री सुषमा स्वराज और रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर पहले से ही लूप में थे। राष्ट्रीय   सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और थल सेना अध्यक्ष खुद  इस सर्जिकल स्ट्राइक की निगरानी कर रहे थे। म्यांमार सरकार को भी विश्वास  में लिया गया था। सीमा पार का इतनी बडी सैन्य कार्रवाई सेना स्थानीय स्तर पर नहीं कर सकती। जाहिर है रक्षा मंत्री पाकिस्तान अधिकृत  कश्मीर  में सर्जिक्ल स्ट्राइक से राजनीतिक फायदा उठाना चाहते हैं। ताजा चुनावी सर्वेक्षण के अनुसार उत्तर प्रदेश , पंजाब और उत्तराखंड का जनमानस पाकिस्तान में सर्जिकल स्ट्राइक के लिए मोदी सरकार के कायल हैं। इन तीनों राज्यों में जनवरी-फरवरी 2017 में विधानसभा चुनाव होने हैं। रक्षा मंत्री का यह कथन भी गलत है कि सेना ने पहले कभी कोई सर्जिकल स्ट्राइक नहीं की थी। देश  के एक अग्रणी समाचार पत्र में हाल ही प्रकाशित रिपोर्ट  के अनुसार जुलाई 2011 में पाकिस्तान सेना द्वारा  कश्मीर  घाटी के कुपवाडा सेक्टर में भारतीय सैन्य शिविर पर हमले के बाद अगस्त 2011 को पाकिस्तान के खिलाफ “ऑपरेशन जिंजर“ को अंजाम दिया था। बहरहाल, सेना की कोई भी क्रॉस-बॉर्डर कार्रवाई बगैर रक्षा मंत्रालय और उच्च सेनाधिकारियों के दखल के नहीं की जा सकती।  नेताओं के इस तरह के बयानों से देश  का मखौल उड रहा है। सेना का अपनी गरिमा है और इसे किसी भी सूरत में कमतर नहीं किया जाना चाहिए। देश  के रक्षा मंत्री द्वारा राजनीतिक लाभ के लिए सेना के शौर्य को कमतर आंकना बेहद दुखद है।  सुरक्षा बलों की  शौर्य  गाथाओं पर राजनीति नहीं की जानी चाहिए।