गोवा में 15 अक्टूबर से षुरु होने वाले दो दिवसीय ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से ठीक पहले न्युक्लियर सप्लायर ग्रुप (एनएसजी) में भारत की एंट्री को लेकर चीन के रुख में आया बदलाव काबिलेगौर है। इस बदलाव को आतंक के प्रायोजक पाकिस्तान के अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलग-थलग पडने की पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। भारत के मामले में चीन हमेशा पाकिस्तान को सामने रखकर आगे बढता है। चीन एनएसजी में भारत के प्रवेश को अब तक कथित सैद्धांतिक तौर पर विरोध करता रहा है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा से ठीक पहले चीन ने एनएसजी में भारत की एंट्री पर नरम पडते हुए कहा है कि वह इस सिलसिले में आगे बातचीत करने के लिए तैयार है। आतंकी सरगना जैश -ए-मोहम्मद के मुखिया मसूद अजहर के मामले में चीन द्धारा संयुक्त राष्ट्र संघ में वीटो के प्रयोग पर भारत की आलोचना के बाद चीन ने एनएसजी पर यह पासा फेंका है। मगर चीन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आतंकी मसूद अजहर के मामले में वह अपने स्टैंड से टस-से-मस होने वाला नहीं है। स्पष्टतय, चीन भारत को सिर्फ बातचीत में उलझना चाहता है। चीन बेहद काइंया कूटनीतिज्ञ है और उसकी हर चाल में गहरे निहित स्वार्थ होते हैं। भारत द्धारा न्युक्लियर सप्लायर में ऐंट्री के लिए आवेदन करते ही चीन की शह पर पाकिस्तान ने भी तत्काल आवेदन कर दिया। ऐसा इसलिए किया गया ताकि अगर अंतरराष्ट्रीय में भारत को एनएसजी में एंट्री दी जाती है, तो चीन पाकिस्तान को भी एंट्री दिला देगा। चीन, भारत की तुलना में पाकिस्तान को कहीं ज्यादा तरजीह देता है और वह पाकिस्तान को बफर स्टैट के रुप में इस्तेमाल कर रहा है। एनएसजी में चीन, भारत की एंट्री का इस बिला पर विरोध कर रहा है कि न्युक्लियर प्लायर गु्रप में सिर्फ वही देश हैं, जिन्होंने परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर हस्ताक्षर कर रखे हैं। 190 देश इस संधि पर हस्ताक्षर कर चुके हैं। भारत, पाकिस्तान, इसरायल और दक्षिण सुडान ने अभी तक परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। भारत को परमाणु अप्रसार संधि के इस प्रावधान पर सख्त ऐतराज है कि द्धितीय विश्व युद्ध (वर्ल्ड वॉर) की पांच बडी शक्तियों को ही परमाणु हथियार रखने की छूट है और चीन इसमें शुमार है। एनसीजी में न्युक्लियर पॉवर स्टेट और नॉन- न्युक्लियर पॉवर स्टेट दोनों को ही शामिल किया गया है मगर इसमें भी भेदभाव है। 1970 से पहले परमाणु हथियार ग्रहण करने वाले चीन, अमेरिका, रुस, फ्रांस और इंग्लैंड को एनएसजी में शामिल किया गया है मगर इसके बाद न्युक्लियर पॉवर स्टेट को परमाणु अप्रसार संधि को स्वीकार करने के बाद ही शामिल किया जाता है। एनएसजी के इस प्रावधान की आड में चीन भारत का विरोध कर रहा है। एनएसजी के मामले में भारत के समक्ष “एक तरफ कुआं, तो दूसरी तरफ खाई“ जैसी स्थिति है। भारत के दो पडोसी देश - चीन और पाकिस्तान- घातक परमाणु हथियारों से लैस है। इस स्थिति के दृष्टिगत भारत को न्यूनतम परमाणु निवारक सुरक्षा कवच की दरकार है। अगर भारत परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर करता है, तो उसे अपने परमाणु हथियार नष्ट करने पडेंगें। एनएसजी में शामिल नहीं होने की स्थिति में भारत अंतरराष्ट्रीय बाजार से परमाणु सामग्री और प्रोन्नत टकनॉलॉजी नहीं खरीद पाएगा। अभी भारत स्वदेशी परमाणु टकनॉलॉजी से ही काम चला रहा है। चीन का रुख अभी भी भारत के प्रति आक्रामक है। बात-बात पर चीन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का विरोध करता है। पाकिस्तान को आतंकी स्टेट मानना तो दीगर रहा, अलबत्ता चीन आतंक की आड में इस्लामाबाद को अलग-थलग करने के लिए भारत को ही कोस रहा है। सर्जिकल स्ट्राइक पर जब पूरी दुनिया भारत की पीठ ठोंक रहे है, चीन पाकिस्तान का हमदर्द बना हुआ है। चीन की किसी बात पर भरोसा नहीं किया जा सकता। भारत के मामले में ड्रैगन सिर्फ कूटनीतिज्ञ औपचारिकता निभा रहा है।
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