भारतीय रिजर्व बैंक के नए गर्वनर उर्जित पटेल ने अपनी पहली मौद्रिक नीति में ब्याज सस्ता करके महंगे कर्ज से त्रस्त लोगों को कुछ राहत प्रदान की है। पहली बार ब्याज दरें छह सदस्यीय मोद्रिक नीति समिति (एमपीसी) द्धारा तय की गई हैं। महंगे कर्ज और तरह-तरह के सर्विस चार्जिज ने आम आदमी की कमर तोड रखी है। पिछले साल सितंबर में तत्कालीन आरबीआई गर्वनर ने रेपो रेट में 0.50 फीसदी कटौती करके सभी को चौंका दिया था। इसका सकारात्मक प्रभाव पडा था। दुनिया में तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में भारत उन देशों में शुमार है, जहां ब्याज अभी भी काफी महंगा है। रेपो रेट में 0.25 फीसदी की कटौती से त्यौहारी सीजन में उधोग और बाणिज्य जगत के अलावा होम लोन लेने वालों को भी थोडी राहत मिलेगी । ताजा कटौती से रेपो रेट छह साल के न्यूनतम 6.25 फीसदी स्तर पर आ गया है। रिवर्स रेपो रेट 6 फीसदी से घटकर 5.75 फीसदी पर आ गया है। सीआरआर (केश रिजर्व रेशो ) चार फीसदी पर ही रखी गई है। पिछली बार अप्रैल माह में आरबीआई ने रेपो रेट में 0.25 फीसदी की कटौती की थी जबकि जून और अगस्त में रेपो रेट यथावत रखे गए थे। रेपो रेट में कटौती से बैंको को आरबीआई से सस्ता कर्ज मिलता है और बैंको से उम्मीद की जाती है कि वे सस्ते ब्याज का फायदा ग्राहकों को दें। रेपो रेट अगर छह साल के निचले स्तर पर हैं तो ब्याज दरें भी छह साल के न्यूनतम स्तर पर आनी चाहिए। मगर यह तभी संभव है जब बैंक आरबीआई की सम्पूर्ण ब्याज कटौती को ग्राहकों तक पहुंचाए। मगर ऐसा नहीं हो रहा है। 2014 के बाद से ताजा कटौती तक आरबीआई अब तक ब्याज को दो फीसदी सस्ता कर चुका है मगर अधिकांश बैंक ग्राहकों को ब्याज में बमुश्किल एक फीसदी भी राहत नहीं दे पाए हैं। दूसरी ओर रेपो रेट बढते ही बैंक ब्याज बढाने में जरा भी देर नहीं करते है। ब्याज दरों में ताजा कटौती से 30 लाख तक के होम लोन वालों को हर माह 500 रु की बचत होनी चाहिए अगर बैंक ब्याज कटौती को संजीदगी से लागू करे। इस हिसाब से पिछले दो साल में तीस लाख होम लोन चुकाने वालों को कम-से-कम 3000 रु मासिक की राहत मिलनी चाहिए मगर किसी भी बैंक ने ग्राहकों को इतनी बडी राहत नहीं दी है। आरबीआई ने त्योहारी सीजन में कर्ज सस्ता करके मांग को उठाने की कोशिश की है। भारत में त्योहारों के दौरान जमकर खरीदारी करने की रिवायत है। नवरात्र से शुरु होकर त्योहारी सीजन दीवाली तक चलता है और इस दौरान गरीब से गरीब भी खूब खरीदारी करता है। इसी बात के दृष्टिगत आरबीआई के नए गर्वनर ने उधोग और वाणिज्य जगत को राहत प्रदान की है। आरबीआ ई ने दिसंबर में मुद्रा स्फीति दर पांच फीसदी रहने की उम्मीद जताई है। इस स्थिति में ब्याज दरों में इस वित्तीय साल में एक और रेट कट की उम्मीद की जा सकती है। वैसे पूरी दुनिया में इस समय मंदी छाई हुई है और वैश्विक मांग काफी कमजोर है। अमेरिका के सेंट्रल बैंक (फेडेरल रिजर्व) पर पूरे विश्व की नजरें टिकी हुई हैं। नवंबर में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव सपन्न होते ही फेडेरल रिजर्व ब्याज दरें बढा सकता है। इसका एमर्जिंग मार्केट्स की ब्याज दरों पर असर पड सकता है। बहरहाल, भारत को अपनी तेज ग्रोथ को बरकरार रखने के लिए मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को गति देनी होगी। सितंबर में कमजोर मांग के कारण फैक्टरी उत्पादन में फिर गिरावट आई है। कच्चे माल की ऊंची कीमतें और महंगा कर्ज फैक्टरी उत्पादन को उठाए नहीं उठने दे रहा है। कर्जा सस्ता होने और त्योहारी सीजन में मांग मजबूत होने से मैन्युफेक्चरिंग सेक्टर को गति मिलने की उम्मीद की जा सकती है। सस्ते होम लोन से रियल्टी सेक्टर को भी राहत मिल सकती है। लंबे समय से यह सेक्टर मंदी की चपेट में है। सस्ता कर्ज समय की मांग है। मंदी के वैश्विक दौर से बचने का यह पुख्ता विकल्प है।
बुधवार, 5 अक्टूबर 2016
ग्रोथ उन्मुख सस्ता कर्ज
Posted on 7:48 pm by mnfaindia.blogspot.com/
भारतीय रिजर्व बैंक के नए गर्वनर उर्जित पटेल ने अपनी पहली मौद्रिक नीति में ब्याज सस्ता करके महंगे कर्ज से त्रस्त लोगों को कुछ राहत प्रदान की है। पहली बार ब्याज दरें छह सदस्यीय मोद्रिक नीति समिति (एमपीसी) द्धारा तय की गई हैं। महंगे कर्ज और तरह-तरह के सर्विस चार्जिज ने आम आदमी की कमर तोड रखी है। पिछले साल सितंबर में तत्कालीन आरबीआई गर्वनर ने रेपो रेट में 0.50 फीसदी कटौती करके सभी को चौंका दिया था। इसका सकारात्मक प्रभाव पडा था। दुनिया में तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में भारत उन देशों में शुमार है, जहां ब्याज अभी भी काफी महंगा है। रेपो रेट में 0.25 फीसदी की कटौती से त्यौहारी सीजन में उधोग और बाणिज्य जगत के अलावा होम लोन लेने वालों को भी थोडी राहत मिलेगी । ताजा कटौती से रेपो रेट छह साल के न्यूनतम 6.25 फीसदी स्तर पर आ गया है। रिवर्स रेपो रेट 6 फीसदी से घटकर 5.75 फीसदी पर आ गया है। सीआरआर (केश रिजर्व रेशो ) चार फीसदी पर ही रखी गई है। पिछली बार अप्रैल माह में आरबीआई ने रेपो रेट में 0.25 फीसदी की कटौती की थी जबकि जून और अगस्त में रेपो रेट यथावत रखे गए थे। रेपो रेट में कटौती से बैंको को आरबीआई से सस्ता कर्ज मिलता है और बैंको से उम्मीद की जाती है कि वे सस्ते ब्याज का फायदा ग्राहकों को दें। रेपो रेट अगर छह साल के निचले स्तर पर हैं तो ब्याज दरें भी छह साल के न्यूनतम स्तर पर आनी चाहिए। मगर यह तभी संभव है जब बैंक आरबीआई की सम्पूर्ण ब्याज कटौती को ग्राहकों तक पहुंचाए। मगर ऐसा नहीं हो रहा है। 2014 के बाद से ताजा कटौती तक आरबीआई अब तक ब्याज को दो फीसदी सस्ता कर चुका है मगर अधिकांश बैंक ग्राहकों को ब्याज में बमुश्किल एक फीसदी भी राहत नहीं दे पाए हैं। दूसरी ओर रेपो रेट बढते ही बैंक ब्याज बढाने में जरा भी देर नहीं करते है। ब्याज दरों में ताजा कटौती से 30 लाख तक के होम लोन वालों को हर माह 500 रु की बचत होनी चाहिए अगर बैंक ब्याज कटौती को संजीदगी से लागू करे। इस हिसाब से पिछले दो साल में तीस लाख होम लोन चुकाने वालों को कम-से-कम 3000 रु मासिक की राहत मिलनी चाहिए मगर किसी भी बैंक ने ग्राहकों को इतनी बडी राहत नहीं दी है। आरबीआई ने त्योहारी सीजन में कर्ज सस्ता करके मांग को उठाने की कोशिश की है। भारत में त्योहारों के दौरान जमकर खरीदारी करने की रिवायत है। नवरात्र से शुरु होकर त्योहारी सीजन दीवाली तक चलता है और इस दौरान गरीब से गरीब भी खूब खरीदारी करता है। इसी बात के दृष्टिगत आरबीआई के नए गर्वनर ने उधोग और वाणिज्य जगत को राहत प्रदान की है। आरबीआ ई ने दिसंबर में मुद्रा स्फीति दर पांच फीसदी रहने की उम्मीद जताई है। इस स्थिति में ब्याज दरों में इस वित्तीय साल में एक और रेट कट की उम्मीद की जा सकती है। वैसे पूरी दुनिया में इस समय मंदी छाई हुई है और वैश्विक मांग काफी कमजोर है। अमेरिका के सेंट्रल बैंक (फेडेरल रिजर्व) पर पूरे विश्व की नजरें टिकी हुई हैं। नवंबर में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव सपन्न होते ही फेडेरल रिजर्व ब्याज दरें बढा सकता है। इसका एमर्जिंग मार्केट्स की ब्याज दरों पर असर पड सकता है। बहरहाल, भारत को अपनी तेज ग्रोथ को बरकरार रखने के लिए मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को गति देनी होगी। सितंबर में कमजोर मांग के कारण फैक्टरी उत्पादन में फिर गिरावट आई है। कच्चे माल की ऊंची कीमतें और महंगा कर्ज फैक्टरी उत्पादन को उठाए नहीं उठने दे रहा है। कर्जा सस्ता होने और त्योहारी सीजन में मांग मजबूत होने से मैन्युफेक्चरिंग सेक्टर को गति मिलने की उम्मीद की जा सकती है। सस्ते होम लोन से रियल्टी सेक्टर को भी राहत मिल सकती है। लंबे समय से यह सेक्टर मंदी की चपेट में है। सस्ता कर्ज समय की मांग है। मंदी के वैश्विक दौर से बचने का यह पुख्ता विकल्प है।






